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खलीलाबाद में 200 फीट ऊंचे मोबाइल टावर पर चढ़ा युवक, समस्या सुनाने के लिए अपनाया खतरनाक रास्ता


जमीन विवाद में कार्रवाई न होने से नाराजगी का दावा, सुबह से टावर पर बैठा रहा व्यक्ति; पुलिस समझाने में जुटी, मौके पर जुटी भीड़

Report- Sayeed Pathan Editor Mission Sandesh 

खलीलाबाद। कोतवाली खलीलाबाद क्षेत्र के मोती नगर बाईपास चौराहे से समय माता मंदिर जाने वाले मार्ग पर सेंट्रल बैंक के पास मंगलवार सुबह उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब एक युवक करीब 200 फीट ऊंचे मोबाइल टावर पर जा चढ़ा। देखते ही देखते मौके पर लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई और हर किसी की नजर टावर पर बैठे व्यक्ति पर टिक गई।

बताया जा रहा है कि प्रभुनाथ नामक युवक सुबह करीब आठ बजे टावर पर चढ़ा और समाचार लिखे जाने तक नीचे नहीं उतरा था। सूचना मिलते ही पुलिस और डायल-112 और फायर ब्रिगेड की टीम मौके पर पहुंची। सभी पुलिसकर्मी लगातार उसे समझाने और सुरक्षित नीचे उतरने की अपील करते रहे। प्रशासन की प्राथमिकता फिलहाल उसे किसी भी तरह सुरक्षित नीचे उतारना है।

जमीन विवाद और प्रशासन पर कार्रवाई न करने का आरोप

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार प्रभुनाथ थाना मेहदावल क्षेत्र के किसी गांव का निवासी बताया जा रहा है। चर्चा है कि उसका जमीन को लेकर किसी व्यक्ति से विवाद चल रहा है और वह कथित तौर पर पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है। वहीं प्रेम प्रसंग की भी चर्चा चल रही है इसी नाराजगी में वह अपनी बात को परिवारजन और जिला प्रशासन तक पहुंचाने के लिए मोबाइल टावर पर चढ़ गया।

हालांकि, जमीन विवाद, या प्रेम प्रसंग के मामले को लेकर पूर्व में की गई शिकायत और पुलिस-प्रशासन द्वारा कार्रवाई न किए जाने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है। इसलिए इन दावों की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

सवाल सिर्फ टावर पर चढ़ने का नहीं, उस समस्या का भी है जिसके कारण यह कदम उठाया गया

यह घटना केवल एक व्यक्ति के करीब 200 फीट ऊंचे टावर पर चढ़ जाने की तस्वीर नहीं है। इसके पीछे यदि वास्तव में कोई जमीन संबंधी विवाद और प्रशासनिक स्तर पर सुनवाई न होने की शिकायत है, या प्रेम प्रसंग का मामल है, तो उस पहलू की भी गंभीरता से जांच जरूरी है।

किसी नागरिक को अपनी समस्या रखने के लिए आखिर ऐसे खतरनाक कदम तक क्यों पहुंचना पड़ा? यदि उसने पहले शिकायतें की थीं तो उनकी सुनवाई किस स्तर पर हुई? क्या संबंधित अधिकारियों ने उसकी समस्या को गंभीरता से लिया या वह लगातार कार्यालयों के चक्कर लगाता रहा? इन सवालों के जवाब घटना के बाद महज पुलिस कार्रवाई से नहीं, बल्कि पूरे मामले की निष्पक्ष पड़ताल से सामने आने चाहिए।

विरोध का यह तरीका समाधान नहीं, जान जोखिम में डालने वाला कदम है

दूसरी तरफ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि अपनी मांग मनवाने के लिए मोबाइल टावर पर चढ़ना किसी भी स्थिति में उचित या सुरक्षित रास्ता नहीं है। जमीन, रोजगार, पारिवारिक विवाद या प्रशासनिक शिकायत—किसी भी समस्या का समाधान व्यक्ति की जिंदगी को खतरे में डालकर नहीं हो सकता।

आज सोशल मीडिया के दौर में ऐसी घटनाएं कुछ ही समय में व्यापक चर्चा का विषय बन जाती हैं। इससे एक चिंताजनक प्रवृत्ति भी जन्म ले सकती है कि अपनी बात तत्काल सुर्खियों में लाने के लिए लोग खतरनाक तरीकों को विरोध का माध्यम मानने लगें। यदि ऐसी सोच बढ़ी तो यह समाज और प्रशासन दोनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।

एक तरफ नागरिक की पीड़ा को सुनना प्रशासन की जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ अपनी जान जोखिम में डालना समाधान नहीं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिकायत, जनसुनवाई, उच्चाधिकारियों से संपर्क और न्यायिक प्रक्रिया जैसे रास्ते मौजूद हैं। जरूरत इस बात की है कि ये रास्ते आम नागरिक को वास्तव में सुगम और भरोसेमंद महसूस हों।

फिलहाल पुलिस प्रशासन की चुनौती सबसे पहले प्रभुनाथ को सुरक्षित नीचे उतारने की है। इसके बाद वास्तविक सवाल उसकी समस्या और उसके पीछे की परिस्थितियों का है। यदि जमीन विवाद की शिकायत है तो उसका निष्पक्ष निस्तारण होना चाहिए और यदि प्रशासन पर लगाए गए आरोप तथ्यहीन हैं तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए।

क्योंकि किसी नागरिक को अपनी बात कहने के लिए 200 फीट ऊंचे टावर का सहारा न लेना पड़े—यही संवेदनशील प्रशासन और सुरक्षित समाज की असली कसौटी है।

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