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लेखक के विचार

रावण दहन के उद्घाटन में लगे जय श्रीराम के नारे, रावण ने कहा हे-राम, वीवीआईपी ने दी ये सज़ा

रावण दहन के उद्घाटन के लिए न्योते गए वीवीआईपी जी पूरे, बल्कि उससे भी थोड़े से ज्यादा एक्स्ट्रा जोश में थे। और जल्दी में तो खैर थे ही। पब्लिक से वोट मांगने की तारीख सिर पर थी। नो भाषण, ओन्ली उद्घाटन की शर्त मनवा कर आए थे। पर जोश तो जोश ठहरा। रावण दहन के लिए अग्निबाण चलाने का अभिनय करने से पहले, लगे जय श्रीराम के नारे लगाने। वीवीआईपी नारा लगाए, तो मंच पर भला कोई कैसे पीछे छूट जाए। पर रावण! वह पट्ठा नारा लगा के ही नहीं दे। एक बार हुआ, दो बार हुआ, जब तीसरी बार भी रावण ने जवाबी नारा नहीं लगाया, रामलीला प्रबंधकों के दिल की धडक़न बढ़ गयी और वीवीआईपी जी की त्यौरी चढ़ गयीं। प्रबंधक जी ने टहोका मारकर रावण से बुलवाने की कोशिश की। पर वह तो जैसे सुट्टा मार गया। न ऊं न आं, कुछ भी नहीं करे।

वीवीआईपी जी ने इसे अपनी पर्सनल इन्सल्ट माना। उन्होंने नारा उठाया, उसका भी जवाब नहीं दिया! पर उन्होंने मुकद्दमा भगवान राम की इन्सल्ट का बनाया। रामलीला प्रबंधक ने शिकायत के जरिए सफाई देने की कोशिश की–आजकल ये आर्टिस्ट लोग भी…। पर वीवीआईपी जी इतनी आसानी से माफ करने या भूल जाने वाले नहीं थे। आदेश दे दिया — रावण को बुलाया जाए। मुझे उसके मुंह से सुनना है, ऐसा क्यों किया? भगवान का नाम लेने से इंकार क्यों कर दिया? दर्शन का छोंक लगाते हुए बोले — जिसके मन में राम की भक्ति न हो, ऐसे रावण के दहन का ही क्या लाभ?

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रावण को दूर पर बने उसके मंच से बुलाया गया। प्रबंधक आदि सब के सामने ही वीवीआईपी जी ने पूछा — भगवान की जय बोलना मंजूर नहीं है, तब तो तुम्हें उनके हाथों मरना भी मंजूर नहीं होगा। फिर यहां क्या कर रहे हो? रावण का संक्षिप्त जवाब था–एक्टिंग। पूछा — जय बोलने में क्या प्राब्लम है। रावण बोला, मैं अपने करेक्टर में हूं। तीर मारो और छुट्टी करो; पर मरने वाले से जैकारे की उम्मीद मत रखो। मारने वाले की जैकार कौन करता है, जी!

पर वीवीआईपी जी ने हार नहीं मानी। बाकी सब से बोले, दो मिनट अकेले में रावण से बात करने दें। प्रबंधक जी ने जाते-जाते हाथ जोड़ विनती की — दो ही मिनट, पब्लिक बेचैन हो रही है। वीवीआईपी जी ने रावण से कहा — कैरेक्टर में होने की खूब कही। पर अब असली वजह भी बता ही दो, तुमने जैकारा क्यों नहीं लगाया? निश्चिंत रहो, बात हमारे बीच ही रहेगी। रावण बोला — हां! दो एक्टरों के बीच की बात! वीवीआईपी जी चौंके — माने! रावण कुछ लापरवाही से बोला — आप भी तो करेक्टर में ही हो, एक्टिंग ही तो कर रहे हो, मेरी तरह।

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वीवीआईपी जी ने फिर भी हार नहीं मानी और एक आखिरी कोशिश करने लगे — अब बता भी दो। भगवान राम की जैकार तुम क्यों नहीं करते? रावण के सुर में कुछ तेजी आ गयी — राम का जैकार करने में प्राब्लम मुझे नहीं आप लोगों को है। वीवीआईपी जी बोले — माने? माने ये कि यह जय श्रीराम वाले श्रीराम कौन हैं? हम बचपन से सियाराम को जानते हैं, भगवान राम को भी जानते हैं, पर ये जय श्रीराम वाले श्रीराम कहां से आ गए! तुम्हारे हैं, तुम्हीं जैकारा लगाते रहो।

वीवीआईपी जी ने भडक़ के कहा — तू अपने करेक्टर में ही रह। और तड़ाक से तीर चला दिया। रावण के मुंह से निकला — हे राम और उसका पुतला गिर गया। अब वीवीआईपी जी के माथा ठोकने की बारी थी।

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(व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।)

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