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लेखक के विचार

जहाँ जहाँ पांव पड़े मंत्रिन के…!(व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

किसी ने सच कहा है। डेमोक्रेसी में मंत्री होना बड़ी फजीहत का काम है। जो कहीं डेमोक्रेसी अपने इंडिया टाइप की हो‚ तब तो कहना ही क्याॽ बताइए‚ यूपी वाले नंदगोपाल गुप्ता जी‚ मिर्जापुर में दलित गंगाधर के घर भोजन के लिए पधारे‚ पर उसकी खबर तो बनी मुश्किल से चार लाइन की। गुप्ता जी की जात गई और दलित उद्धार के प्रचार का मजा भी नहीं आया। पर गुप्ता जी के घर में पांव पड़ने के बाद भी दलित गंगाधर के उद्धार में क्या-क्या कसर रह गई‚ इसकी कहानियां सुर्खियों में हैं।

बेचारे मंत्री लोगों के दलितों का उद्धार करने में मुश्किलें ही मुश्किलें हैं। दलितों के साथ खाना नहीं खाएं, तो सब कहते हैं कि दलितों के साथ रोटी का रिश्ता ही नहीं रखना चाहते। दलितों के साथ रोटी का रिश्ता बनाने किसी दलित को अपने घर बुलाएं‚ तो लोग कहते हैं कि अपने हाथ का छुआ दलित को खिलाया तो क्या हुआ‚ दलित के हाथ का छुआ खाकर दिखाओ तो जानें। और किसी दलित के घर खाने जाएं तो और मुसीबत को न्यौतें‚ जैसे गुप्ता जी न्यौत बैठे। गंगाधर के घर पर खाने तो पहुंच गए‚ पर खाएं तो क्याॽ चलो पनीर की सब्जी तो स्पेशल थी‚ सो सरपंच जी के घर से बनकर आ गई। दाल वगैरह भी पड़ोस में किसी और ने बनाकर भेज दी। पर कम–से–कम बाजरे की रोटी तो दलित की घरवाली के ही हाथ की बनी थी। पर इतने में भी पट्ठे दलित को दिक्कत हो गई। कहता है मांग–जांच के कहीं से सौ रुपए का देसी घी लाया‚ तब मंत्री जी ने चुपड़ी रोटी का भोग लगाया। हमारे नसीब में ऐसी चुपड़ी कहां!

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और मंत्री जी ने छक कर अच्छी तरह से हाथ धोए भी नहीं थे कि बंदों के रोने शुरू हो गए। दलित गंगाधर के पास तो राशन कार्ड भी नहीं है। गंगाधर के पास सरकारी मदद वाला पक्का तो क्या, अधपक्का मकान भी नहीं है। गंगाधर के घर में नल नहीं है। गंगाधर के घर में शौचालय नहीं है। गंगाधर के घर पर बिजली का कनेक्शन नहीं है। और भी न जाने क्या–क्या नहीं हैॽ काश! कोई यह तो बताता कि दलित गंगाधर के पास अब क्या है‚ जो पहले नहीं था। गंगाधर के पास उद्धार है‚ जो उसकी झोंपड़ी में अपनी जूठन गिराकर गुप्ताजी ने उसे दिया है।

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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