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मंत्री जी, आखिर कैसे बच गए भ्रष्ट अधिकारी ?

मंत्री सज्जन सिंह वर्मा

श्रीगोपाल गुप्ता की रिपोर्ट

मध्यप्रदेश में एक वर्ष पहले कांग्रेस की सरकार बनते ही शासकिय अधिकारी व कर्मचारियों के ताबड़तोड़ तबादले हुये! इन तबादलों की रफ्तार का आलम यह था कि चारो तरफ अधिकारी व कर्मचारियों में अफरा-तफरी मच गई! राजधानी भोपाल में स्थिति इतनी विकट और तंग हो गई कि सरकारी गेस्ट हाउस सहित होटल, धर्मशाला और सराय तक में रुकने की जगह मिलना मुस्किल हो गया था! जिधर देखो वहीं अधिकारी और कर्मचारियों का मेला सा परवान चढ़ गया था और इस मेले का एक ही दस्तूर था कि जैसे भी हो अपनी मन पंसद जगह पर तैनाती कराना! इस दौरान देश और प्रदेश की जनता को यह भी देखने को मिला कि इन तबादलों की सुनामी में कई अधिकारियों के तबादले एक ही दिन में तीन-तीन, चार-चार जगहों में हो गये!जब इन तबादलों के सन्दर्भ में प्रदेश की कमलनाथ सरकार के तेज-तर्रार मंत्री सज्जन सिंह वर्मा से पूछा गया तो उन्होने रहस्य उदघाटन करते हुये कहा कि प्रदेश में पन्द्रह हजार अधिकारी व कर्मचारी भ्रष्ट हैं! इसलिए हमारी सरकार इनके तबादले कर रही है! हालांकि उनके बयान से प्रदेश की राजनीति गरमा गई मगर आम जनता ने राहत की सांस ली कि आखिर भ्रष्ट सरकार के एजेंडे में शामिल हैं और उन पर गाज गिरना तय है! मगर प्रदेश में अब एक्का-दुक्का तबादलों को छोड़कर तबादलों का दौर थम सा गया है, ऐसे में जब सामने आ रहा है कि एफआईआर शुदा भ्रष्टाचार व कदाचार के आरोपी अधिकारी मजे में बड़ी ठाठ से योग्यताविहीन होते हुये बड़े-बड़े पदों पर बैठकर सीना तान कर जमे पड़े हैं! ऐसे में मंत्री जी और उनकी सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठना लाजिमी है!

मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के ही लोकनिर्माण विभाग के ग्वालियर स्थित संभाग कार्यालय में ऐसा उदाहरण सामने आया है! मामला है मात्र एसडीओ के पद की योग्यता रखने वाले डीपी साहू को प्रभारी कार्यपालन अधिकारी लोकनिर्माण विभाग (विधुत/यांत्रिक) बना दिया गया! जबकि साहू के खिलाफ एक एफ आई आर पुलिस में आर्थिक अपराध अन्बेषण ब्यूरो द्वारा वर्ष 2012 में गंभीर आर्थिक अनिमियता को लेकर धारा 420,409,467,468,471,120,13,(1),13(2) में दर्ज है! जो कि विवेचना में ई. ओ, डब्ल्यू में 7 सालों से लटका हुआ है! समझा जा सकता है कि यह मामला किन कारणों से ई, ओ, डब्ल्यू में लटका पड़ा हुआ है! सवाल यह है कि जब सरकार भ्रष्टों का तबादला कर रही थी या कर रही है तो साहू जैसे भ्रष्टाचार के आरोपी कैसे बिना योग्यता के एक बड़े और बरिष्ठ पद पर बिराजमान है? जबकि उनके अन्तगर्त संभाग में लगभग आठ जिले आते हैं! हैरत तो तब होती है जब भाजपा के विधायक राजेश कुमार प्रजापति विधानसभा में साहू के खिलाफ प्रश्न उठाते हैं तो जबाव मिलता है कि ऐसी कोई जानकारी नहीं है और जब कांग्रेस के ही विधायक रघुराज सिंह कंषाना साहू को हटाने के लिए प्रमुख सचिव को पत्र लिखते हैं तो उस पत्र को भी रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया जाता है! जबकि मप्र शासन की गाइड लाइन कहती है कि ऐसे भ्रष्टाचारी के आरोपी अधिकारियों को जांच होने तक मुख्य पदों पर न रखा जाये! फिर ऐसी कोन सी मजबूरी या जरुरी है कि भ्रष्टों का तबादला करने का दावा करने वाली सरकार गंभीर भ्रष्टचारों के आरोपी को इस महत्वपूर्ण पद पर जमाये हुये है?निश्चित ही यह कमलनाथ की सरकार पर प्रश्न चिण्ह खड़ा करती है!

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