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धर्म निरपेक्षता और संविधानके खिलाफ है नागरिकता संशोधन बिल-अब्दुल्लाह आरटीआई कार्यकर्ता

नागरिकता संशोधन बिल पास होने से देश में अशांति और बेचैनी का माहौल 

संसद और राज्य सभा में सी ए बी अर्थात सिटिज़न अमेण्डमेन्ट बिल यानि कि नागरिकता संशोधन बिल पास तो हो गया।
इस बिल की मुखालिफत में तमाम स्यासी जमाअतें संविधान के समानता के अधिकार और मौलिक अधिकारों को हनन करने वाला बताया है।
इस बिल में आखिर हिन्दू,सिक्ख, ईसाई, बौद्ध,जैन, पारसी को ही नागरिकता देने की बात क्यों कही गई है?
यह बिल 1955ई०के नागरिकता कानून को संशोधित कर धर्म विशेष के लोगो को ही नागरिकता देने के लिए बनाया गया है।
इस बिल का उद्देश्य अवैध प्रवासियों को नागरिकता देना है।
जो भारत देश की धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है।
उक्त बिल में मुसलमानों का उल्लेख न किया जाना बहुत ही खेदजनक और चिन्ता का विषय है।
इसका मुख्य उद्देश्य पड़ोसी देश पाकिस्तान और अफगानिस्तान और बंग्लादेश से प्रताणित छः समुदाय हिन्दू,सिक्ख, ईसाई,जैन,पारसी बौद्ध, को ही नागरिकता देना बिल में बताया गया है।
क्या भारत के पड़ोसी देश सिर्फ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंग्लादेश ही हैं?
श्रीलंका,म्यांमर , तिब्बत और चीन पड़ोसी देश नहीं है?
इन देशों के शरणार्थियों का बिल में उल्लेख क्यों नहीं किया गया है?
इस बिल से भारत सरकार की हिन्दू राष्ट्र बनाने वाली मन्शा को बल मिलता है।
इस बिल से संविधान की भावनाओं को ठेस पहुंचती है।
संख्या बल की बदौलत बिल तो पास करा लिया गया है।
लेकिन देश हित को दरकिनार कर दिया गया है।
इस बिल के पास होने से जिस प्रकार देश में उहापोह की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
सरकार और सरकार के लोगों को इस पर विचार करना चाहिए।
इस बिल के विरोध में जिस प्रकार से धरने और मुज़ाहरे किए जा रहे हैं,वे इस बात का सुबूत है कि सरकार अपनी नकारात्मकता और संख्या बल बूते देश के मुसलमानों के साथ भेदभाव कर रही है।
सरकार ने इस बिल में उक्त छः धर्मों के लोगों को नागरिकता के लिए योग्य निर्धारित तिथि 31दिसम्बर 2014 तक जो भारत में आ चुके हों,भारत के नागरिक बन जाएंगे।
भले ही वे अवैधानिक रूप से आए हों वैध मान लिए जाएंगे।
भारत में सर्वप्रथम वीर सावरकर ने ही 1935में टूनेशन थ्योरी की नींव अहमदाबाद में रखी थी।
उन्हीं के सपने को मौजूदा सरकार पूरा कर रही है।
“एन आर सी और सी ए बी” का मकसद यही है कि मुल्क को हिन्दू राष्ट्र बना दिया जाए।
यह बिल धार्मिक निरपेक्षता और संविधान के भी खिलाफ है।
लेकिन खिलाफ होने के बावजूद भी भारत सरकार के मन्शा के अनुरूप है,जो इस बिल के जरिए यह दिखाना चाहते हैं कि हम अपनी मर्ज़ी के अनुसार ही देश को चलाएंगे।
देश कानून से चलता है नकि तानाशाही से।
देश से घुसपैठियों को निकालना है तो उनका धर्म और मजहब नहीं देखना चाहिए।
इस देश को आजाद कराने में सबने अपनी कुर्बानी पेश की है।
भारत देश, किसी एक धर्म या मज़हब के लोगों का नहीं है।
अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले अगर किसी ने जंग की शुरुआत की थी तो वह मुसलमान ही थे।
जिन्हें आज अपने ही देश में दूसरे दर्जे का शहरी मानते हुए तरह तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है।
पूरी मुस्लिम कम्यूनिटी भारत सरकार की इस आधारहीन और असंवैधानिक बिल (सिटिज़न अमेण्डमेन्ट बिल) का विरोध करती है।

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