टॉप न्यूज़महाराष्ट्र

कब रुकेगा “अंधे कुएं” में यह मौत का सिलसिला -:अशोक भाटिया

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के गोवंडी इलाके में अंधे कुएं (सेप्टिक टेंक ) में उतरे तीन मजदूर दम घुटने से मर गए | सब जानते है अंधे कुएं (सेप्टिक टेंक ) में उतरना खतरनाक व जोखिमभरा है पर आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति अपने और अपने परिवार को दो वक्त की रोटी देने के लिए जोखिमभरा कम भी करने को तैयार हो जाते है |सेप्टिक टेंक में होने वाली यह पहली मौत नहीं है |अब तक सेप्टिक टैंक में सफाई के लिए उतरे 7 7 6 लोगों की मौत हो चुकी है | इसके पहले देश की राजधानी दिल्ली के लाजपत नगर में सीवर की सफाई के दौरान तीन मजदूरों की दम घुटने से मौत हो गई । और भी पहले दिल्ली में ही वॉटर हॉर्वेस्टिंग के लिए बनाए गए एक गड्ढे से निकली जहरीली गैसों ने चार मजदूरों की जान ली थी । इसी साल मार्च के दौरान तमिलनाडु के कड्डलोर जिले में तीन मजदूरों को एक सीवर टैंक की सफाई में लगाया गया था और उनकी भी दम घुटने से मौत हो गई थी । इसी महीने में कुछ ऐसा ही काम करते हुए बेंगलुरु में तीन मजदूर मारे गए थे । इससे पहले फरवरी में मुंबई में सीवर की सफाई करते हुए तीन लोगों की जान चली गई थी । ये आंकडे सिर्फ इस साल के हैं ।इन आंकड़ों के अनुसार मेनहोल दशकों से सीवेज सफाईकर्मियों के लिए कब्रगाह साबित हो रहे हैं । केंद्र सरकार भले ही स्वच्छ भारत अभियान पूरे जोर-शोर से चला रही हो, लेकिन इससे इन सफाईकर्मियों के काम का जोखिम जरा भी कम नहीं हुआ है । वहीं सबसे शर्मनाक बात यह है कि कामगारों को हाथ से मैला ढोने या साफ करने (मैनुअल स्कैवेंजिंग) के काम पर लगाने की रोकथाम और ऐसे लोगों के पुनर्वास से जुड़ा कानून (पीईएमएसआर एक्ट – 2013) होने के बावजूद नगरपालिकाएं और सफाई का ठेका लेने वाली एजेंसियां इन्हें कोई सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं करवातीं । जबकि सीवर या ऐसी ही गंदगी भरी जगहों में इन्हें कार्बन डाई-ऑक्साइड, मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड और कार्बन मोनो-ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों के बीच में ही काम करना पड़ता है । कानून यह कहता है कि हर स्थानीय निकाय या एजेंसी द्वारा सीवर, सेप्टिक टैंक या ऐसे ही दूसरी जगहों की सफाई के लिए सभी जरूरी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि हाथ से मैला ढोने या उसकी सफाई के तरीकों का उन्मूलन किया जा सके ।
हालाकि पहली बार सन 1986 में इस समस्या को गंभीरता से लिया गया। भारत सरकार ‘द एम्पलॉयमेंट ऑफ मैन्युअल स्कैवेंजर्स एंड कंस्ट्रक्शन ऑफ ड्राय लैट्रिन्स नामक एक एक्ट लेकर आई। इसके तहत गंदगी निकालने के विकल्पों की तलाश और इसे बैन करने पर काम होना था। मगर अफसोस यह एक्ट लागू नहीं हो पाया।इसी क्रम में एक लंबे इंतजार के बाद 1993 में एक नया कानून आया। इससे लोगों में उम्मीद जगी, लगा हालात सुधारेंगे। मगर अफसोस, कुछ खास नहीं बदला। 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक भारत में करीब 1.6 लाख लोग नालों व सीवेज टैंकों की सफाई के काम में लगे हैं।इस आंकड़े ने 1993 में बने कानून पर सवाल खड़े किए। लिहाजा, 2013 में इस कानून को अपडेट किया गया। इसके तहत मैला उठाना या उठवाना जुर्म हो गया। सजा और जुर्माना भी तय हो गया। लगा अच्छे दिन आ गए, लेकिन आए नहीं। सूरत यह है कि 2019 में भी बिना किसी सुरक्षा के सफाई कर्मियों का सीवर में उतरना जारी है। यही कारण है कि सीवर के अंदर मल में उनकी मौत की खबरें आम हो चली हैं।
अशोक भाटिया, अ/००१ वेंचर अपार्टमेंट ,वसंत नगरी,वसई पूर्व जिला पालघर

इस पोस्ट से अगर किसी को कोई आपत्ति हो तो कृपया 24 घंटे के अंदर Email-missionsandesh.skn@gmail.com पर अपनी आपत्ति दर्ज कराएं जिससे खबर/पोस्ट/कंटेंट को हटाया या सुधार किया जा सके, इसके बाद संपादक/रिपोर्टर की कोई जिम्मेदारी नहीं होग

Related posts

मुम्बई में बारिश का कहर:: रेल ट्रैक पर पानी भरने से ट्रेन में फंसे सैकड़ो यात्री,,मुंबई, ठाणे और पालघर में रेड अलर्ट घोषित

Sayeed Pathan

अंग्रजों ने वीर सावरकर को क्यों रोका था वकालत से और क्यों वापस ले ली थी डिग्री-जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर

Sayeed Pathan

केंद्र सरकार की चेतावनी -: ट्रैफिक नियम के खिलाफ जाने वाले राज्यों में लगेगा राष्ट्रपति शासन

Sayeed Pathan

एक टिप्पणी छोड़ दो

error: Content is protected !!