उतर प्रदेश राजनीति

स्वामी प्रसाद मौर्य का भाजपा में घटता कद, बेटे के लिए टिकट, इस्तीफे की वजह सरकार की गिनाईं नीतियां

लखनऊ उत्तर प्रदेश । चुनाव से ठीक पहले मंगलवार को यूपी की राजनीति में बड़ा उलटफेर सामने आया। सेवा एवं श्रम समेत 4 मंत्रालय संभाल रहे स्वामी प्रसाद मौर्य एकाएक भाजपा छोड़ सपा में शामिल हो गए। भाजपा अब मामले को संभालने में लग गई है। केशव प्रसाद मौर्य ने ट्वीट कर स्वामी से अपील की है कि हम बैठकर बातचीत करेंगे। हालांकि, स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के बाद माना जा रहा है कि भाजपा की पॉलिटिकल इंटेलिजेंस फेल हो गई है। इस तर्क के पीछे वजह भी है।

दरअसल, सोमवार देर शाम भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत 24 बड़े पदाधिकारी भाजपा प्रदेश कार्यालय में चुनावी मीटिंग कर रहे थे। इधर स्वामी प्रसाद मौर्य सपा में जाने की तैयारी कर रहे थे। हालांकि, यह बात कई दिनों से चर्चा में थी कि भाजपा अपने 150 से ज्यादा वर्तमान विधायकों के टिकट काटेगी। हालांकि, यह इनपुट कहीं से नहीं था कि स्वामी प्रसाद मौर्य का टिकट भी कट सकता था। पूरे पांच साल वह मंत्री पद पर भी बने रहे और बेटी भी बदायूं से सांसद है।

यह बात कई दिनों से चर्चा में थी कि भाजपा अपने 150 से ज्यादा वर्तमान विधायकों के टिकट काटेगी।

कहीं बेटे का टिकट तो नहीं बना वजह?
स्वामी प्रसाद मौर्य ने राजनीति में अपनी बेटी संघमित्रा को तो सेट कर दिया है, लेकिन अभी तक अपने बेटे उत्कृष्ट मौर्य को सेट नहीं कर पाए हैं। 2012 में स्वामी प्रसाद मौर्य ने बसपा के टिकट पर रायबरेली के ऊंचाहार से उत्कृष्ट को लड़ाया, लेकिन सपा के मनोज पांडेय के आगे वह हार गए।

2017 में स्वामी प्रसाद ने अपने दम पर फिर ऊंचाहार से भाजपा के टिकट पर बेटे को लड़ाया, लेकिन वह चुनाव भी उत्कृष्ट हार गए। अब भाजपा भी 2022 जीतने के लिए हर विधानसभा में जिताऊ कैंडिडेट पर ही फोकस कर रही है। ऐसे में भाजपा सूत्रों का मानना है कि बेटे का टिकट ही उनके जाने की वजह हो सकता है।

2012 में मौर्य ने बसपा के टिकट पर रायबरेली के ऊंचाहार से बेटे उत्कृष्ट को लड़ाया था, पर वे हार गए थे।

जितना बड़ा राजनीतिक कद, उतना महत्व नहीं मिला

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यूपी में 8% से ज्यादा मौर्य और कुशवाहा वोट हैं। इन पर स्वामी प्रसाद मौर्य की अच्छी पकड़ मानी जाती है। दरअसल, स्वामी प्रसाद मौर्य खुद पूर्वांचल के पडरौना से चुनाव लड़ते हैं तो बेटी पश्चिमी यूपी के बदायूं से सांसद हैं और जबकि बेटे को अवध के रायबरेली के ऊंचाहार से चुनाव लड़ाते हैं। ऐसे में उनके कद का अंदाजा लगाया जा सकता है।

बहरहाल, भाजपा सूत्रों का मानना है कि पार्टी में जितना केशव प्रसाद मौर्य को महत्व मिला है, उतना स्वामी प्रसाद मौर्य को नहीं मिला है। केशव प्रसाद जहां डिप्टी सीएम के पद पर है तो स्वामी प्रसाद 5 साल कैबिनेट मिनिस्टर बनकर रहे।

स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा में मायावती के खास सिपहसालारों में गिने जाते थे। भाजपा में मौर्य भले ही मंत्री पद पर रहे, लेकिन योगी आदित्यनाथ या अन्य किसी बड़े चेहरे के खास नहीं बन पाये। जबकि सपा में वह अखिलेश यादव की जरूरत भी हैं। दरअसल, मुलायम सिंह यादव के समय पार्टी में जाति संतुलन रहता था। अखिलेश में उसकी कमी है। मौर्य वोटों के लिए एक बड़े चेहरे की भी सपा को जरूरत थी। जो कि अब पूरी हो गई है।

भाजपा को कितना होगा नुकसान ?

राजनीतिक जानकर मानते हैं कि भाजपा के पास पिछड़ा वोट बैंक के लिए कई बड़े चेहरे हैं। अब रही बात स्वामी प्रसाद मौर्य की तो कुशीनगर में विकास के नाम पर एयरपोर्ट वगैरह भी है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर कुशीनगर और रायबरेली जैसे इलाकों में थोड़ा बहुत प्रभाव डाल सकते हैं।

अखिलेश पिछड़ों को एकजुट करने में जुटे
2017 के चुनाव में भाजपा को सत्ता में पहुंचाने का श्रेय पिछड़ी जातियों को जाता है और इस बार अखिलेश यादव हर हाल में पिछड़ी जातियों को अपनी तरफ मोड़ने में लगे हैं। यही वजह है कि अखिलेश ने छोटे-छोटे दलों से गठबंधन के अलावा पिछड़े नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कराने का अभियान छेड़ रखा है।

स्वामी प्रसाद मौर्य ने 2017 के चुनाव में बीजेपी में ओबीसी जातियों को जोड़ने में अहम भूमिका अदा की थी। स्वामी प्रसाद की खुद की पकड़ अपने समाज और तमाम पिछड़ी जातियों पर है। स्वामी के जाने से भाजपा के इस समीकरण को झटका लग सकता है, चुनाव से पहले पिछड़ी जातियों में यह संदेश पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।

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