सावित्रीबाई फुले : नारी मुक्ति, शिक्षा और सामाजिक क्रांति की अग्रदूत
आलेख - मोनिका कश्यप भारतीय समाज के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने अपने संघर्ष, साहस और विचारों से न केवल अपने समय को बदला, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी नई राहें खोलीं। ऐसी ही एक महान क्रांतिकारी महिला थीं सावित्रीबाई फुले, जिन्हें भारत की पहली महिला शिक्षिका, नारी शिक्षा की जननी और सामाजिक समानता की प्रखर आवाज़ के रूप में जाना जाता है। उन्होंने उस दौर में शिक्षा, समानता और स्त्री अधिकारों की बात की, जब समाज रूढ़ियों, अंधविश्वासों और जातिगत भेदभाव में जकड़ा हुआ था। प्रारंभिक जीवन सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में एक साधारण माली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे पाटिल था। उस समय समाज में लड़कियों की शिक्षा को न केवल अनावश्यक बल्कि पाप तक माना जाता था। बाल विवाह की प्रथा आम थी, जिसके तहत सावित्रीबाई का विवाह मात्र 9 वर्ष की आयु में ज्योतिराव फुले से कर दिया गया। हालाँकि यह विवाह उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। ज्योतिराव फुले एक प्रगतिशील विचारधारा के व्यक्ति थे, जिन्होंने सावित्रीबाई को पढ़ने-लिखन...