Report by- Mohammad Sayeed Pathan Editor Mission Sandesh
संतकबीरनगर। नाबालिग को बहला-फुसलाकर भगा ले जाने और दुष्कर्म के करीब आठ साल पुराने मामले में आखिरकार अदालत ने अपना फैसला सुना दिया। विशेष पॉक्सो न्यायालय ने अभियुक्त सोनू कुमार को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के सश्रम कारावास और कुल 8,000 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है। यह फैसला 9 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया। पुलिस इसे ‘ऑपरेशन कन्विक्शन’ अभियान के तहत प्रभावी पैरवी का परिणाम बता रही है, लेकिन मामले की समयावधि न्यायिक प्रक्रिया की गति पर भी ध्यान खींचती है।
2018 में दर्ज हुआ था मुकदमा
पुलिस के अनुसार, मामला दुधारा थाने में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 52/2018 से संबंधित है। पीड़िता के भाई ने 25 फरवरी 2018 को शिकायत दर्ज कराई थी कि सोनू कुमार पुत्र राजकुमार, निवासी रसूलपुर मिश्रौली (मूड़ाडीहा बेग), थाना दुधारा, उसकी नाबालिग बहन को बहला-फुसलाकर भगा ले गया।
मामले की विवेचना उपनिरीक्षक शैलेन्द्र शुक्ला ने की थी। पुलिस का कहना है कि साक्ष्य संकलन के बाद आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया गया। इसके बाद मामले की सुनवाई न्यायालय में चली और अब फैसला आया है।
तीन धाराओं में दोषसिद्धि, 10 साल का सश्रम कारावास
पुलिस से प्राप्त विवरण के मुताबिक, अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट कृष्ण कुमार-V की अदालत ने अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 366 और 376 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 3/4 के तहत दोषसिद्ध किया।
अदालत ने धारा 363 के तहत तीन वर्ष के सश्रम कारावास और 2,000 रुपये जुर्माने, धारा 366 के तहत पांच वर्ष के सश्रम कारावास और 2,000 रुपये जुर्माने तथा धारा 376 के तहत 10 वर्ष के सश्रम कारावास और 4,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना अदा नहीं करने पर अलग-अलग अतिरिक्त कारावास का भी प्रावधान किया गया है।
‘ऑपरेशन कन्विक्शन’ की सफलता, लेकिन देरी पर भी चर्चा जरूरी
संतकबीरनगर पुलिस इस फैसले को ‘ऑपरेशन कन्विक्शन’ के तहत गुणवत्तापूर्ण विवेचना और अभियोजन की प्रभावी पैरवी की उपलब्धि बता रही है। नाबालिग के खिलाफ अपराध के मामले में दोषसिद्धि और सजा को पीड़ित पक्ष के लिए न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
हालांकि, घटना और मुकदमा दर्ज होने के लगभग आठ वर्ष बाद फैसला आने का पहलू भी महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में केवल सजा की घोषणा ही नहीं, बल्कि यह समझना भी जरूरी है कि सुनवाई में कितना समय लगा, देरी के क्या कारण रहे और पीड़ित पक्ष को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। उपलब्ध पुलिस विवरण में इन सवालों के जवाब नहीं दिए गए हैं, इसलिए देरी के लिए किसी एक पक्ष को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
फिलहाल, अदालत का फैसला मामले में न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव है। पुलिस इसे अपनी प्रभावी पैरवी का परिणाम बता रही है, जबकि इस प्रकरण से यह सवाल भी सामने आता है कि गंभीर अपराधों से जुड़े मुकदमों का निस्तारण समयबद्ध तरीके से सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था को और कितना प्रभावी बनाया जा सकता है।
नोट: यह खबर पुलिस द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण पर आधारित है। न्यायालय के विस्तृत निर्णय की प्रति उपलब्ध होने पर सजा के समवर्ती या क्रमिक संचालन सहित अन्य कानूनी विवरणों की पुष्टि की जा सकती है।

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