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नहीं पहुँच पा रहै हैं आम जनता तक नागरिकता संशोधन कानून के सही मायने- अशोक भाटिया


नागरिकता संशोधन कानून को लेकर आम जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए भाजपा ने एक अभियान शुरू करने का जो फैसला किया वह देर से उठाया गया कदम ही दिखता है। कायदे से यह काम तो अब तक हो जाना चाहिए था। पार्टी के साथ मोदी सरकार को भी आम जनता से संपर्क-संवाद की जरूरत तभी समझ लेनी चाहिए थी जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नागरिकता कानून पर व्यापक प्रचार-प्रसार की दरकार है। दरअसल नागरिकता संशोधन कानून देश के नागरिकों एवं अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ नहीं है, कम से कम पढ़े लिखे लोग पढ़कर समझ ही विरोध करें। विरोधी एवं उत्पाती लोगों का दिल बड़ा है अच्छी बात है ।


यदि आपको घुसपैठियों से दिक्कत नहीं तो उन बेचारे सैनिकों की बलि देने की क्या जरूरत है जो बॉर्डर पर तैनात हैं। सारे बॉर्डर खोल देने चाहिए ना? इतना बड़ा दिल है तो अपने घरों के दरवाजे भी छोड़ दीजिए खुले, सर्दी का मौसम है फुटपाथ पर सोने वाले लोग आराम से आकर सोएं घरों में। जब आप अपना घर खुला नहीं छोड़ सकते तो राष्ट्र को घुसपैठियों के लिये कैसे खुला छोड़ सकते हैं? कॉलेज स्टूडेंट का क्या मतलब है विरोध करने का? सड़कों पर उतरने का? बसें फूंकने का? विरोध का क्या यही तरीका है कि सरकारी संपत्ति में आग लगाओ? विरोध का मतलब नग्न अराजकता नहीं हो सकता।


दिल्ली में अराजक भीड़ ने जिस तरह दिन-दहाड़े कई बसों और दोपहिया वाहनों को आग के हवाले किया उससे तो यही लगता है कि सुनियोजित तरीके से नागरिकता कानून विरोधी हिंसा को हवा दी जा रही है। चिंताजनक यह है कि यह खतरनाक काम देश के अनेक हिस्सों में हो रहा है। कई राजनीतिक दल इसके लिए अतिरिक्त मेहनत करते भी दिख रहे हैं। दुष्प्रचार में लिप्त ऐसे दलों की केवल आलोचना ही पर्याप्त नहीं। उन्हें बेनकाब भी किया जाना चाहिए। इसके साथ ही मानवतावादी होने का मुखौटा लगाए उत्पाती तत्वों को यह सख्त संदेश भी देना होगा कि किसी भी सूरत में हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।



निःसंदेह किसी के लिए भी यह समझना कठिन है कि दिल्ली में जामिया मिलिया विश्वविद्यालय अथवा उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों को नागरिकता कानून का विरोध करने की जरूरत क्यों पड़ रही है ? आखिर जब यह स्पष्ट है कि इस कानून का भारतीय मुसलमानों से कहीं कोई लेना-देना नहीं तब फिर उसके विरोध का क्या औचित्य ? स्पष्ट है राजनीतिक अस्तित्व लगातार खो रहे राजनीतिक दल सत्ता तक पहुंच बनाने का यह अराजक रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। उत्पात का पर्याय बन गए इस उन्माद भरे हिंसक विरोध से कड़ाई से निपटना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कानून के शासन एवं लोकतांत्रिक मूल्यों का मजाक हो रहा है। अब युद्ध के मैदानों में सैनिकों से नहीं, भितरघात करके, निर्दोषों को प्रताड़ित एवं उत्पीड़ित कर लड़ा जाता है। सीने पर वार नहीं, पीठ में छुरा मारकर लड़ा जाता है। इसका मुकाबला हर स्तर पर हम एक होकर और सजग रहकर ही कर सकते हैं।



अशोक भाटिया 
 अ /1 वैंचर अपार्टमेंट , वसंत नगरी , वसई पूर्व ( जिला – पालघर ) 
       


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