मनरेगा में पारदर्शिता की बुनियाद: ग्राम पंचायत छितही में सोशल ऑडिट बैठक, ग्रामीणों के समक्ष रखी गई खर्च की पूरी रिपोर्ट
सईद पठान की रिपोर्ट
संतकबीरनगर, 4 अगस्त 2025।
गांव की तरक्की केवल सड़क, नाली और तालाब से नहीं होती — विश्वास, सहभागिता और जवाबदेही उसकी असली नींव होती है। इसी सोच के तहत जनपद संतकबीरनगर के नाथनगर ब्लॉक के ग्राम पंचायत छितही में सोमवार को सोशल ऑडिट बैठक का आयोजन किया गया। इस आयोजन की कमान संभाली ब्लॉक रिसोर्स पर्सन (BRP) संतोष पांडेय ने, जिनके नेतृत्व में यह प्रक्रिया पारदर्शिता और सहभागिता की मिसाल बनी।
मनरेगा कार्यों का स्थलीय सत्यापन
इस बैठक से पूर्व दो दिनों तक ग्राम सभा में मनरेगा योजनाओं के अंतर्गत कराए गए कार्यों का स्थल निरीक्षण और सत्यापन किया गया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कागज़ पर दिखने वाले काम धरातल पर भी मौजूद हैं या नहीं। सत्यापन के दौरान टीम ने कार्यों की गुणवत्ता, श्रमिकों की उपस्थिति, भुगतान की स्थिति और परियोजनाओं की उपयोगिता का सूक्ष्म अवलोकन किया।
ग्रामीणों के समक्ष पेश किया गया लेखा-जोखा
सोमवार को आयोजित इस सोशल ऑडिट बैठक में 2025-26 में मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों की विस्तृत समीक्षा की गई। इसमें न सिर्फ खर्च की गई धनराशि का विवरण साझा किया गया, बल्कि काम की संख्या, मजदूरी का वितरण, सामग्री की आपूर्ति और संबंधित योजनाओं की स्थिति पर भी चर्चा हुई। ग्रामीणों के बीच यह खुला मंच उनकी भागीदारी का प्रतीक रहा, जिसमें उन्होंने न केवल पूरे कार्य को सही ठहराया, बल्कि काम के प्रति संतोष और भरोसे का भी इज़हार किया।
जवाबदेही की मिसाल
बीआरपी संतोष पांडेय ने स्पष्ट कहा कि,
"सरकारी योजनाओं के हर रुपये का हिसाब जनता के पास होना चाहिए। सोशल ऑडिट का उद्देश्य ही यही है — लोगों को यह भरोसा दिलाना कि सरकारी धन सही हाथों में और सही दिशा में जा रहा है।"
इस मौके पर ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक, ग्राम पंचायत सचिव समेत दर्जनों ग्रामीण उपस्थित रहे। कुछ ग्रामीणों ने छोटे सुझाव और शिकायतें भी साझा कीं, जिनका समाधान करने का आश्वासन टीम द्वारा दिया गया।
विश्लेषण:
ग्रामीण विकास योजनाओं में सोशल ऑडिट एक ऐसा माध्यम है जो न केवल सरकारी कामकाज की पारदर्शिता सुनिश्चित करता है, बल्कि जनता को भी योजनाओं की निगरानी में भागीदार बनाता है। छितही ग्राम पंचायत की यह पहल बताती है कि जब प्रशासन और जनता साथ आते हैं, तो न केवल योजनाएं बेहतर ढंग से लागू होती हैं, बल्कि भ्रष्टाचार और अपव्यय की गुंजाइश भी खत्म हो जाती है।
इस आयोजन ने यह भी साबित किया कि पारदर्शिता कोई दस्तावेजी प्रक्रिया नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है, और अगर ईमानदारी से लागू हो, तो यह गांव को सशक्त और जागरूक बना सकती है।
"सोशल ऑडिट से निकली आवाज़ सिर्फ आंकड़ों की नहीं, भरोसे की होती है — और छितही गांव ने आज यह भरोसा कायम कर दिखाया है।"


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