वादा स्मार्ट स्कूल का, हकीकत में ज़मीन पर बैठते बच्चे: पीएम श्री योजना की हकीकत पर एक जमीनी पड़ताल
रिपोर्ट- मोहम्मद सईद पठान
संतकबीरनगर, 5 अगस्त 2025। "पीएम श्री स्कूल" — नाम में ही उम्मीद है, एक ऐसे विद्यालय की परिकल्पना जिसमें स्मार्ट क्लास, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं, फर्नीचर से सुसज्जित कक्षाएं, और बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए हर आवश्यक संसाधन हों। लेकिन जब इन वादों को ज़मीन पर कसौटी पर कसते हैं, तो सामने आती है एक कड़वी सच्चाई: बच्चे अब भी फर्श पर बैठने को मजबूर हैं, प्रयोगशालाएं महज़ काग़ज़ों में हैं और डिजिटल क्लास एक अधूरी कल्पना बनकर रह गई है।
घोषणाओं में चमक, जमीनी हालात में सूनापन
सरकार और स्थानीय प्रशासन का दावा है कि पीएम श्री योजना के तहत प्राथमिक से लेकर उच्च माध्यमिक विद्यालयों तक में —
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छात्र छात्राओं के लिए-अनुकूल फर्नीचर
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स्मार्ट कक्षाएं,
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आईसीटी/कंप्यूटर लैब,
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कौशल और विज्ञान प्रयोगशालाएं,
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खेल के मैदान व सामग्री
जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। यह कहा गया कि विद्यालयों को मॉडल स्कूल के रूप में विकसित किया जा रहा है, ताकि सरकारी विद्यालयों की छवि और गुणवत्ता में आमूलचूल परिवर्तन हो।
लेकिन जब संतकबीरनगर के कई स्कूलों का स्थलीय निरीक्षण किया गया, तो नज़ारा बिलकुल उल्टा मिला। तमाम विद्यालयों में बच्चों के बैठने के लिए बेंच-डेस्क तक नहीं हैं। बच्चे आज भी धूल भरे फर्श पर टाट पट्टी बिछाकर पढ़ने को मजबूर हैं।
अध्यापक बोले – “कागजों में है विकास, हकीकत में कुछ नहीं बदला”
कुछ विद्यालयों के शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि,
“हमसे रिपोर्ट मांगी गई थी कि हमें किन सुविधाओं की आवश्यकता है। हमने पूरी सूची भेजी थी, लेकिन अभी तक स्कूल में कुछ भी नहीं पहुंचा है। स्कूल आज भी पहले जैसा है।”
बच्चे बोले – "हम भी पढ़ना चाहते हैं स्मार्ट क्लास में"
कक्षा 5 में पढ़ने वाले एक छात्र ने मासूमियत से कहा,
“हमारे चाचा के बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं। उनके स्कूल में टीवी जैसा बोर्ड है, जिसमें वीडियो चलता है। हमारे स्कूल में कुछ नहीं है।”
यह कथन उस बच्चे का नहीं, पूरे सरकारी तंत्र के खोखले वादों का बयान है।
अभिभावकों की नाराज़गी
अभिभावक भी सरकार से यही सवाल कर रहे हैं —
“अगर सरकारी स्कूल में वही सुविधा होती, जो प्राइवेट में है, तो हम फीस भरने को मजबूर क्यों होते?”
आज भी ग्रामीण और निम्न आयवर्ग के माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा भी सम्मानजनक वातावरण में, बेहतर संसाधनों के साथ पढ़े। लेकिन जब स्कूल में फर्नीचर ही न हो, तो वे कैसे भरोसा करें?
विश्लेषण:
पीएम श्री योजना एक क्रांतिकारी सोच है, लेकिन इसकी सफलता महज़ घोषणाओं से नहीं, जमीनी कार्यों से तय होगी।
इस योजना की बुनियाद बच्चों के लिए बेहतर सीखने का माहौल देना है, लेकिन यदि मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो पा रहीं, तो यह योजना केवल कागज़ों की शोभा बनकर रह जाएगी।
सरकारी विद्यालयों की दशा सुधारने के लिए ज़रूरी है कि —
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प्रत्येक विद्यालय में भौतिक सुविधाओं की त्वरित समीक्षा हो,
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शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों की मांगों को प्राथमिकता दी जाए,
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और स्थानीय प्रशासन जवाबदेह हो कि कितने संसाधन आवंटित हुए और कितने पहुंचे।
निष्कर्ष:
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाला हर बच्चा भी "भारत का भविष्य" है। उसे वो हर सुविधा मिलनी चाहिए जो एक खास वर्ग के बच्चे को मिलती है।
यदि पीएम श्री योजना का सपना साकार करना है, तो ज़रूरी है कि बयान नहीं, बदलाव दिखे।
क्योंकि जब बच्चा फर्श पर बैठेगा, तो सपनों की ऊंचाई खुद-ब-खुद छोटी हो जाएगी।
"सरकारी स्कूलों की बदहाली कोई आंकड़ा नहीं, वह हर उस बच्चे का टूटा सपना है, जो अच्छे भविष्य की आस लिए हर सुबह स्कूल आता है।"

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