उन्नाव रेप कांड: सुप्रीम कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की जमानत पर लगाई रोक, सीबीआई की दलीलों को माना गंभीर


नई दिल्ली। उन्नाव रेप कांड, जिसने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, एक बार फिर न्यायिक बहस के केंद्र में है। इस मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत पर तत्काल रोक लगाते हुए यह स्पष्ट संकेत दिया है कि नाबालिग से दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों में न्याय का पैमाना केवल तकनीकी आधार पर नहीं तौला जा सकता।

दिल्ली हाईकोर्ट के जमानत आदेश को चुनौती देते हुए सीबीआई द्वारा दायर याचिका पर सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सुनवाई की। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में यदि कोई व्यक्ति जेल से बाहर आ चुका हो, तो अदालत उसकी स्वतंत्रता छीनने से परहेज करती है, लेकिन यह मामला अलग है, क्योंकि कुलदीप सेंगर अभी भी एक अन्य मामले में जेल में बंद है। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर रोक लगाने का आदेश दिया।

सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सख्त रुख अपनाते हुए अदालत के सामने यह सवाल रखा कि क्या एक नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म के दोषी को राहत देना न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है। उन्होंने बताया कि सेंगर पर आईपीसी की धारा 376 और पोक्सो एक्ट की धारा 5 व 6 के तहत आरोप तय किए गए थे। ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना था कि पीड़िता की उम्र 15 वर्ष 10 माह थी और इसी आधार पर सेंगर को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

एसजी तुषार मेहता ने यह भी रेखांकित किया कि जब अपराध किसी प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा किया गया हो, तो कानून और अधिक कठोर हो जाता है। उन्होंने दलील दी कि धारा 375 और 376 के तहत ऐसे मामलों में न्यूनतम 20 वर्ष से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। इसके बावजूद हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को उन्होंने गंभीर त्रुटि बताया।

सीबीआई ने हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष पर भी सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि कुलदीप सेंगर पोक्सो एक्ट की धारा 5 के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ की श्रेणी में नहीं आते। तुषार मेहता ने दो टूक कहा कि जब पीड़ित नाबालिग हो, तो अपराधी का पद, प्रभाव या हैसियत कोई मायने नहीं रखती। कानून की नजर में अपराध केवल अपराध होता है।

वहीं, सेंगर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और हरिहरन ने बचाव पक्ष की दलीलें पेश कीं, लेकिन अदालत सीबीआई की आपत्तियों को अधिक गंभीर मानती नजर आई। लंबी बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की जमानत पर रोक लगा दी।

यह फैसला केवल एक व्यक्ति की जमानत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों में न्याय व्यवस्था किसी भी प्रकार की नरमी बरतने के मूड में नहीं है। उन्नाव रेप मामला पहले ही सत्ता, प्रभाव और अपराध के खतरनाक गठजोड़ का प्रतीक बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न केवल पीड़िता के न्याय की दिशा में एक मजबूत कदम है, बल्कि समाज के लिए यह भरोसा भी है कि कानून के सामने कोई भी प्रभावशाली व्यक्ति अछूता नहीं रह 

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