बांग्लादेश: पति की हत्या के बाद कैसे बनीं खालिदा जिया पहली महिला प्रधानमंत्री? जानिए पूरा राजनीतिक सफर


(Report journalist Mohammad Sayeed Pathan)

नई दिल्ली। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख नेता बेगम खालिदा जिया का मंगलवार सुबह 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति का एक निर्णायक और प्रभावशाली अध्याय समाप्त हो गया है।

खालिदा जिया ने दशकों तक देश की राजनीति को दिशा दी और सत्ता व विपक्ष—दोनों भूमिकाओं में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई।

BNP ने की निधन की पुष्टि

BNP ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पेज पर खालिदा जिया के निधन की पुष्टि करते हुए लिखा कि उनका निधन सुबह करीब छह बजे, फज्र की नमाज के तुरंत बाद हुआ। पार्टी ने उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हुए समर्थकों से भी दुआ करने की अपील की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई अंतरराष्ट्रीय नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है।

सामान्य जीवन से सत्ता के शिखर तक का सफर

प्रारंभिक जीवन

खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1945 को ब्रिटिश भारत के दिनाजपुर जिले (वर्तमान बांग्लादेश) में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन सामान्य रहा और युवावस्था तक राजनीति से उनका कोई प्रत्यक्ष जुड़ाव नहीं था।

साल 1960 में, महज 15 वर्ष की उम्र में उनका निकाह बांग्लादेश के सैन्य अधिकारी जिया-उर-रहमान से हुआ, जो आगे चलकर देश के राष्ट्रपति बने।

पति की हत्या ने बदली जिंदगी

खालिदा जिया की राजनीतिक यात्रा एक गहरी त्रासदी से शुरू हुई। उनके पति जिया-उर-रहमान, जिन्होंने 1977 से 1981 तक बांग्लादेश के राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया और 1978 में BNP की स्थापना की, की 1981 में एक सैन्य तख्तापलट के दौरान हत्या कर दी गई।

इसी घटना के बाद खालिदा जिया सार्वजनिक जीवन में उतरीं और BNP की कमान संभाली। धीरे-धीरे वह देश की सबसे ताकतवर राजनीतिक हस्तियों में शामिल हो गईं।

पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का गौरव

साल 1991 में लोकतंत्र की बहाली के बाद हुए आम चुनावों में BNP की जीत के साथ खालिदा जिया बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।

इसके बाद उन्होंने 1996 और 2001 में भी प्रधानमंत्री पद संभाला। उनके कार्यकाल में राष्ट्रवाद, सेना और प्रशासन की भूमिका तथा भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर कई अहम फैसले लिए गए।

समर्थक उन्हें सशक्त और निर्णायक नेता मानते रहे, जबकि आलोचक उनके शासन को टकराव और ध्रुवीकरण से जोड़ते हैं।

विवादों से घिरा रहा राजनीतिक जीवन

खालिदा जिया का तीसरा कार्यकाल 2001 से 2006 तक रहा। इस दौरान अर्थव्यवस्था, निजीकरण और बुनियादी ढांचे पर काम हुआ, लेकिन साथ ही उनकी सरकार भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक कमजोरियों और कट्टरपंथी तत्वों को संरक्षण देने के आरोपों में भी घिरी रही।

उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी आवामी लीग की नेता शेख हसीना रहीं। दोनों नेताओं की प्रतिद्वंद्विता ने दशकों तक बांग्लादेश की राजनीति को आकार दिया।

2006 में इस्तीफा और सत्ता से विदाई

साल 2006 में बढ़ते जनविरोध के बीच खालिदा जिया को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, जिसके बाद देश में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।

2008 के आम चुनावों में आवामी लीग की जीत के साथ शेख हसीना सत्ता में आईं। इसके बाद खालिदा जिया के खिलाफ भ्रष्टाचार सहित 32 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए, जिससे उनकी राजनीतिक और व्यक्तिगत मुश्किलें बढ़ती चली गईं।

जेल, बीमारी और अंतिम वर्ष

साल 2018 में खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के मामलों में जेल भेजा गया। इस दौरान उनकी सेहत लगातार गिरती गई।

लगातार मांगों के बाद 2020 में उनकी सजा निलंबित की गई। बाद में 2025 में सुप्रीम कोर्ट से उन्हें राहत मिली।

वे वर्षों से लीवर सिरोसिस, मधुमेह, गठिया, हृदय और छाती संबंधी बीमारियों से पीड़ित थीं। हाल ही में वे इलाज के लिए यूनाइटेड किंगडम गई थीं और लौटने के बाद ढाका में उपचार चल रहा था।

भारत-बांग्लादेश संबंधों में भूमिका

खालिदा जिया को अक्सर पाकिस्तान समर्थक रुख के लिए जाना गया। उनके कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंधों में अपेक्षित मजबूती नहीं आ सकी।

आलोचकों का आरोप रहा कि उस दौर में पूर्वोत्तर भारत में घुसपैठ और उग्रवादी गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई, जिससे उन पर भारत-विरोधी तत्वों को बांग्लादेश की धरती इस्तेमाल करने की छूट देने के आरोप लगे।

एक युग का अंत

बेगम खालिदा जिया का राजनीतिक जीवन संघर्ष, सत्ता, विवाद और प्रभाव—इन सभी से भरा रहा। समर्थकों के लिए वह साहस और नेतृत्व की प्रतीक रहीं, जबकि आलोचकों के लिए विवादों से घिरी नेता।

उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति में “दो बेगमों के युग” का एक अहम अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया।

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