सिर्फ सहारा नहीं, आत्मनिर्भरता की पहल: नीरजा देवभूमि चैरिटेबल ट्रस्ट ने दिव्यांग महिला को व्हीलचेयर के साथ दिया रोजगार का भरोसा

मिशन संदेश हरिद्वार, 5 मई 2026। सामाजिक सरोकारों को आगे बढ़ाते हुए नीरजा देवभूमि चैरिटेबल ट्रस्ट ने एक सराहनीय पहल के तहत 32 वर्षीय दिव्यांग महिला दीक्षा को व्हीलचेयर प्रदान की। लेकिन यह पहल महज सहायता वितरण तक सीमित नहीं रही, बल्कि संस्था ने उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देने का भी संकल्प लिया, जो इसे एक सामान्य सेवा कार्य से आगे ले जाकर सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बनाता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, दीक्षा लगभग एक दशक पूर्व पेड़ गिरने की दुर्घटना में स्पाइनल कॉर्ड इंजरी का शिकार हो गई थीं, जिसके चलते उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। इस संवेदनशील मामले को जनहित दिव्यांग समिति, हरिद्वार के अनुप कुमार द्वारा नीरजा देवभूमि चैरिटेबल ट्रस्ट के संज्ञान में लाया गया, जिसके बाद संस्था ने त्वरित पहल करते हुए उन्हें व्हीलचेयर उपलब्ध कराई।

सहायता से आगे बढ़कर सशक्तिकरण की सोच

ट्रस्ट द्वारा दीक्षा को स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षित करने का निर्णय इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। आमतौर पर ऐसे मामलों में सहायता एक बार के वितरण तक सीमित रह जाती है, लेकिन यहां संस्था ने दीक्षा को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में दीर्घकालिक सहयोग का भरोसा दिया है।

यह पहल इस बात का उदाहरण है कि यदि सामाजिक संस्थाएं केवल दान तक सीमित न रहकर कौशल विकास और रोजगार से जोड़ें, तो दिव्यांगजन समाज की मुख्यधारा में मजबूती से शामिल हो सकते हैं।

🔹सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल, लेकिन चुनौतियां बरकरार

हालांकि यह पहल सराहनीय है, लेकिन यह भी सच है कि समाज में अभी भी ऐसे अनेक दिव्यांगजन हैं, जिन्हें बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पातीं। सरकारी योजनाओं और सामाजिक संगठनों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता महसूस होती है, ताकि ऐसे प्रयास व्यापक स्तर पर प्रभावी हो सकें।

🔹भविष्य में सहयोग का आश्वासन

ट्रस्ट की चेयरमैन/संस्थापक अध्यक्ष डॉ.नीरजा गोयल ने स्पष्ट किया कि संस्था दीक्षा को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए आगे भी हरसंभव सहयोग करती रहेगी। इस दौरान ट्रस्ट के संस्थापक और अन्य सदस्य भी मौजूद रहे।

नीरजा देवभूमि चैरिटेबल ट्रस्ट की यह पहल सिर्फ एक व्हीलचेयर देने की नहीं, बल्कि एक जिंदगी को फिर से खड़ा करने की कोशिश है। जरूरत इस बात की है कि ऐसे प्रयास अपवाद न बनें, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में स्थापित हों।

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