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करीब 19 करोड़ रुपये के फर्जी जीएसटी घोटाले में बड़ा झटका: दो मुख्य आरोपियों की जमानत याचिका खारिज

  


अदालत ने माना गंभीर आर्थिक अपराध, सरकारी राजस्व को करोड़ों की क्षति पहुंचाने के आरोपों को देखते हुए नहीं मिली राहत

(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)

खलीलाबाद (संतकबीरनगर)। करीब 19 करोड़ रुपये के फर्जी जीएसटी (GST) घोटाले में गिरफ्तार अंतरराज्यीय गिरोह के दो प्रमुख आरोपियों को अदालत से बड़ा झटका लगा है। मामले की गंभीरता, सरकारी राजस्व को भारी नुकसान और सुनियोजित आर्थिक अपराध की प्रकृति को देखते हुए सत्र न्यायाधीश रणधीर सिंह ने दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं निरस्त कर दीं। पुलिस इससे पहले दोनों आरोपियों को दिल्ली से गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज चुकी है।

जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) विशाल श्रीवास्तव ने बताया कि राज्य कर विभाग (खंड-1, संतकबीरनगर) के सहायक आयुक्त अरविंद कुमार की तहरीर पर दर्ज मुकदमे में जांच के दौरान करोड़ों रुपये के फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) घोटाले का खुलासा हुआ था।

फर्जी फर्म बनाकर किया गया करोड़ों का खेल

जांच के अनुसार, गिरोह ने 'सर्व श्री यादव इंटरप्राइजेज' नाम से एक फर्जी फर्म का पंजीकरण कराया। फर्म का प्रोपराइटर रंजीत सिंह यादव को दर्शाया गया, जबकि इसका पता खलीलाबाद के फायर स्टेशन के पास दर्ज कराया गया था।

जांच में सामने आया कि फर्म ने न तो वास्तविक रूप से कोई माल खरीदा और न ही बेचा। केवल कागजी लेन-देन और फर्जी बिलों के आधार पर अन्य फर्मों को ₹18,96,53,679 की बोगस इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) हस्तांतरित की गई, जबकि ₹18,96,80,190 की फर्जी आईटीसी का स्वयं दावा भी किया गया। इस तरह फर्जी इनवॉइस और कागजी कारोबार के माध्यम से सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचाने का आरोप है।

दिल्ली से हुई थी गिरफ्तारी

मामले में मुख्य आरोपी सौरभ अग्रवाल उर्फ सन्नी, निवासी हरिनगर घंटाघर, नई दिल्ली तथा अजीत कुमार, निवासी कैलाशपुरी एक्सटेंशन, पालम कॉलोनी, नई दिल्ली को पुलिस ने पूर्व में दिल्ली से गिरफ्तार किया था। दोनों पर फर्जी कंपनियों के जरिए जीएसटी प्रणाली का दुरुपयोग कर आर्थिक अपराध को अंजाम देने का आरोप है।

सरकार की ओर से जमानत का हुआ कड़ा विरोध

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने आरोपियों को निर्दोष बताते हुए झूठा फंसाए जाने का दावा किया और जमानत की मांग की। वहीं जिला शासकीय अधिवक्ता विशाल श्रीवास्तव ने इसका कड़ा विरोध करते हुए अदालत को बताया कि यह सामान्य आपराधिक मामला नहीं, बल्कि सुनियोजित आर्थिक अपराध है, जिसने सरकारी राजस्व व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुंचाई है।

उन्होंने तर्क दिया कि यदि आरोपियों को जमानत दी जाती है तो वे साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकते हैं, गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं तथा फरार होने की भी आशंका है। अभियोजन पक्ष ने आरोपियों को इस कथित आर्थिक सिंडिकेट का सक्रिय सदस्य और मास्टरमाइंड बताया।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।

हमारी समीक्षा

फर्जी जीएसटी और बोगस इनवॉइस के जरिए किए जाने वाले आर्थिक अपराध केवल सरकारी राजस्व की चोरी नहीं हैं, बल्कि देश की कर व्यवस्था और ईमानदार व्यापारियों के लिए भी गंभीर चुनौती हैं। ऐसे मामलों में न्यायालय का कठोर रुख यह संदेश देता है कि आर्थिक अपराधों को सामान्य अपराध की तरह नहीं देखा जाएगा।

हालांकि इस प्रकरण की वास्तविक सफलता केवल जमानत निरस्त होने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पूरे नेटवर्क, फर्जी कंपनियों के संचालन, लाभार्थियों और वित्तीय लेन-देन की श्रृंखला का पर्दाफाश कर दोषियों को शीघ्र न्यायालय से दंडित कराना है। यदि इस प्रकार के संगठित आर्थिक अपराधों पर लगातार प्रभावी कार्रवाई होती रही, तो कर प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ेगी और सरकारी राजस्व की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

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