(Mohammad Sayeed Pathan Editor Mission Sandesh)
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सार्वजनिक संपत्तियों की रक्षा करना और कानून का समान रूप से पालन सुनिश्चित करना है। लेकिन जब सरकारी भूमि पर वर्षों तक कथित अवैध कब्जे बने रहें, कार्रवाई के आदेश फाइलों तक सीमित रह जाएं, जुर्माने लगाए जाएं और बाद में निरस्त भी हो जाएं, तब सवाल केवल अतिक्रमण का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर खड़ा हो जाता है।
यूपी के संतकबीरनगर, खलीलाबाद तहसील क्षेत्र में सरकारी भूमि पर कथित अवैध कब्जों का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। समय माता मंदिर के समीप स्थित पोखरा, गाटा संख्या 1522 सहित कई सार्वजनिक भूखंडों पर कार्रवाई की बातें समय-समय पर सामने आईं, लेकिन जमीन पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दिए। यदि प्रशासन के अभिलेखों में कार्रवाई दर्ज है, तो फिर सरकारी भूमि आज भी कब्जामुक्त क्यों नहीं है? यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर जनता जानना चाहती है।
सबसे अधिक चिंता उस स्थिति को लेकर है, जिसमें पहले जुर्माना लगाया जाता है, बेदखली के आदेश जारी होते हैं और बाद में वे आदेश निरस्त कर दिए जाते हैं। यदि शुरुआती कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी तो उसे वापस लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी? और यदि वह कार्रवाई त्रुटिपूर्ण थी तो उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी? इन सवालों का जवाब देना प्रशासन की जवाबदेही का हिस्सा होना चाहिए।
यह भी एक गंभीर धारणा बनती जा रही है कि छोटे अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई होती है, जबकि बड़े और प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में प्रशासन की गति धीमी पड़ जाती है। यह धारणा सही हो या गलत, लेकिन यदि प्रशासन समय पर तथ्य और निर्णय सार्वजनिक नहीं करेगा तो ऐसी आशंकाएं स्वाभाविक रूप से जन्म लेंगी। कानून का सम्मान तभी बढ़ता है, जब उसका अनुपालन व्यक्ति की हैसियत देखकर नहीं, बल्कि नियमों के आधार पर किया जाए।
नगर पालिका और तहसील प्रशासन की भूमिका भी इसी कसौटी पर परखी जा रही है। यदि संबंधित भूमि वास्तव में सरकारी है और उस पर अवैध कब्जा है, तो कार्रवाई में विलंब किस कारण से हो रहा है? यदि कब्जे वैध हैं, तो पहले जुर्माना और बेदखली की प्रक्रिया क्यों शुरू हुई? ऐसे मामलों में पारदर्शिता केवल प्रशासन की मजबूरी नहीं, बल्कि जनता का अधिकार है।
प्रदेश सरकार लगातार सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने और भू-माफियाओं के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की नीति की बात करती रही है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर यदि कार्रवाई अधूरी रह जाती है या निर्णयों पर सवाल उठते हैं, तो इससे सरकार की मंशा पर नहीं, बल्कि स्थानीय अमले की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। इसलिए आवश्यक है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा हो और यदि कहीं लापरवाही, अनियमितता या नियमों की अनदेखी हुई है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए।
सरकारी भूमि किसी व्यक्ति या संस्था की निजी संपत्ति नहीं होती। यह जनता की धरोहर है और उसका संरक्षण शासन-प्रशासन का संवैधानिक दायित्व है। इसलिए अब आवश्यकता केवल जांच के आश्वासन की नहीं, बल्कि समयबद्ध, पारदर्शी और निष्पक्ष कार्रवाई की है।
खलीलाबाद की जनता आज केवल एक प्रश्न पूछ रही है—यदि कब्जे अवैध हैं तो कार्रवाई कब होगी, और यदि वैध हैं तो पहले जारी हुए आदेशों का आधार क्या था?
जब तक इन प्रश्नों के स्पष्ट, दस्तावेज़ आधारित और सार्वजनिक उत्तर सामने नहीं आते, तब तक नगर पालिका और तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल समाप्त नहीं होंगे। सुशासन का वास्तविक अर्थ भी यही है कि कानून सबके लिए समान हो और सरकारी संपत्ति पर किसी भी प्रकार के अतिक्रमण के मामले में निर्णय प्रभाव या दबाव से नहीं, बल्कि कानून के आधार पर लिए जाएं।

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