संपादकीय | मिशन संदेश
डिजिटल युग में किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके नाम, पते या मोबाइल नंबर तक सीमित नहीं रह गई है। उसकी तस्वीरें, वीडियो, बैंकिंग संबंधी विवरण, लोकेशन, इंटरनेट पर की गई गतिविधियां और निजी बातचीत तक डिजिटल डेटा का हिस्सा बन चुकी हैं। इस डेटा का इस्तेमाल जहां सुविधाओं को आसान बनाता है, वहीं इसके दुरुपयोग की आशंका किसी व्यक्ति की निजता, प्रतिष्ठा और सुरक्षा को गंभीर खतरे में डाल सकती है। ऐसे समय में भारत का Digital Personal Data Protection Act 2023 डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 यानी DPDP एक्ट एक महत्वपूर्ण कानूनी पहल है। लेकिन इस कानून की वास्तविक सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि नागरिकों के डेटा की सुरक्षा के लिए कितने प्रावधान बनाए गए हैं, बल्कि इससे भी तय होगी कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल कितनी पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही के साथ किया जाता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन कारोबार, मोबाइल एप्लीकेशन, सोशल मीडिया और सरकारी सेवाओं के विस्तार ने नागरिकों के व्यक्तिगत विवरण को अत्यंत मूल्यवान बना दिया है। कई बार लोग किसी एप्लीकेशन का इस्तेमाल करने के लिए उसकी शर्तें पढ़े बिना अपनी सहमति दे देते हैं। कहीं जरूरत से अधिक जानकारी मांगी जाती है, तो कहीं डेटा किस उद्देश्य से एकत्र किया जा रहा है और कितने समय तक रखा जाएगा, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती। डेटा लीक, पहचान की चोरी, फर्जी खातों और व्यक्तिगत जानकारी के व्यावसायिक इस्तेमाल की घटनाएं इस बात की याद दिलाती हैं कि डिजिटल सुविधा के साथ मजबूत कानूनी सुरक्षा भी जरूरी है।
DPDP एक्ट इसी आवश्यकता के बीच नागरिकों के व्यक्तिगत डिजिटल डेटा के प्रसंस्करण को नियंत्रित करने का ढांचा प्रस्तुत करता है। इसका उद्देश्य डेटा का इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारियां निर्धारित करना, नागरिकों को उनके डेटा के संबंध में कुछ अधिकार देना और नियमों के उल्लंघन पर जवाबदेही तय करना है। इस दृष्टि से यह कानून समय की मांग है। किसी नागरिक की निजी जानकारी उसकी जानकारी और अधिकारों की अनदेखी करके इस्तेमाल नहीं की जानी चाहिए। डिजिटल अर्थव्यवस्था का विकास नागरिकों के भरोसे पर निर्भर करता है, और भरोसा तभी कायम होगा जब डेटा का संग्रह, इस्तेमाल और संरक्षण स्पष्ट नियमों के तहत हो।
लेकिन किसी भी कानून की समीक्षा केवल उसके घोषित उद्देश्यों के आधार पर नहीं की जा सकती। यह देखना भी जरूरी है कि उसके प्रावधानों का समाज के अलग-अलग वर्गों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। विशेष रूप से पत्रकारिता, खोजी रिपोर्टिंग, जनहित में सूचना के प्रसार और सरकारी जवाबदेही के संदर्भ में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। लोकतंत्र में निजता का अधिकार जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी जनता का सूचना पाने का अधिकार और मीडिया का स्वतंत्र होकर सवाल पूछना भी है।
पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा दस्तावेजों, डिजिटल रिकॉर्ड, वीडियो, तस्वीरों, गवाहों के बयानों और सार्वजनिक महत्व की सूचनाओं पर आधारित होता है। भ्रष्टाचार, सरकारी योजनाओं में अनियमितता, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, प्रशासनिक लापरवाही और सत्ता के दुरुपयोग जैसे मामलों की पड़ताल में कभी-कभी ऐसे व्यक्तिगत विवरण सामने आते हैं, जिनका संबंध व्यापक जनहित से होता है। यहां एक कठिन सवाल खड़ा होता है—निजता की रक्षा और जनहित में सच सामने लाने के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाएगा?
यह स्पष्ट रहना चाहिए कि किसी व्यक्ति की निजी जानकारी को बिना औचित्य सार्वजनिक करना पत्रकारिता नहीं है। किसी की निजी तस्वीर, पारिवारिक विवरण, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी या व्यक्तिगत बातचीत को केवल सनसनी फैलाने के लिए प्रकाशित करना अनुचित है। लेकिन इसके विपरीत, यदि किसी सार्वजनिक पदाधिकारी के आधिकारिक कार्य, सार्वजनिक धन या जनहित से जुड़े मामले में उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर गंभीर सवाल उठते हैं, तो उन्हें केवल व्यक्तिगत डेटा का हवाला देकर सार्वजनिक चर्चा से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। जनहित और निजता के बीच अंतर करने के लिए स्पष्ट मानक, निष्पक्ष प्रक्रिया और स्वतंत्र समीक्षा आवश्यक हैं।
DPDP एक्ट में पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों पर बहस इसलिए भी जरूरी है कि डेटा संरक्षण का उद्देश्य नागरिकों को अनावश्यक निगरानी और दुरुपयोग से बचाना है, न कि सार्वजनिक जवाबदेही को कमजोर करना। कानून में कुछ परिस्थितियों के लिए विशेष प्रावधान और छूट मौजूद हैं, लेकिन उनका दायरा, व्यावहारिक उपयोग और अन्य कानूनी अधिकारों के साथ उनका संबंध महत्वपूर्ण विषय हैं। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं होगा कि यह कानून पत्रकारिता पर स्वतः प्रतिबंध लगा देता है; उतना ही अनुचित यह मानना होगा कि इसके क्रियान्वयन से मीडिया और सूचना के प्रसार से जुड़े सवाल पैदा ही नहीं हो सकते।
एक और महत्वपूर्ण पहलू छोटे समाचार पोर्टलों, स्वतंत्र पत्रकारों और स्थानीय डिजिटल मीडिया का है। बड़े मीडिया संस्थानों के पास कानूनी सलाहकार, तकनीकी विशेषज्ञ और डेटा प्रबंधन की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन छोटे समाचार संगठनों के संसाधन सीमित होते हैं। ऐसे में अनुपालन की जटिलताएं, तकनीकी खर्च और कानूनी प्रक्रियाओं की अस्पष्टता उनके लिए वास्तविक चुनौती बन सकती हैं। यदि कानून को प्रभावी बनाना है, तो उसके नियम सरल भाषा में उपलब्ध कराने, स्पष्ट दिशा-निर्देश देने और छोटे संस्थानों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने पर भी ध्यान देना होगा। हालांकि, छोटे संस्थान होने का अर्थ यह नहीं कि वे नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएं।
सोशल मीडिया के संदर्भ में भी यह कानून महत्वपूर्ण है। आज किसी व्यक्ति का वीडियो, फोटो या निजी संदेश कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। कई बार बिना सत्यापन के किसी व्यक्ति की पहचान उजागर कर दी जाती है और उसके बाद उसे सामाजिक अपमान, धमकी या आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों में डेटा संरक्षण की अवधारणा नागरिकों के लिए सुरक्षा का आधार बन सकती है। लेकिन कानून का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि वास्तविक डेटा उल्लंघन के खिलाफ कार्रवाई हो और वैध आलोचना, तथ्यात्मक रिपोर्टिंग तथा जनहित में की गई अभिव्यक्ति को अनुचित रूप से दबाया न जा सके।
कानून की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था कितनी सुलभ और निष्पक्ष है। क्या आम नागरिक आसानी से शिकायत कर सकेगा? क्या उसे समय पर न्याय मिलेगा? क्या बड़ी कंपनियों और प्रभावशाली संस्थाओं के विरुद्ध भी समान रूप से कार्रवाई होगी? क्या नियामक व्यवस्था स्वतंत्रता और पारदर्शिता के मानकों पर खरी उतरेगी? इन सवालों का जवाब केवल कानूनी प्रावधानों से नहीं, बल्कि उनके वास्तविक क्रियान्वयन से मिलेगा।
सरकार की जिम्मेदारी केवल कानून बनाकर समाप्त नहीं हो जाती। नागरिकों को जागरूक करना, संस्थाओं को जवाबदेह बनाना, डेटा सुरक्षा की तकनीकी क्षमता विकसित करना और शिकायत निवारण को प्रभावी बनाना भी उतना ही आवश्यक है। दूसरी ओर, डिजिटल प्लेटफॉर्म और निजी संस्थाओं को भी यह समझना होगा कि नागरिकों की जानकारी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसका उपयोग बिना जवाबदेही के किया जा सकता है। नागरिकों को भी अपनी डिजिटल सहमति, गोपनीयता सेटिंग और व्यक्तिगत जानकारी साझा करने के जोखिमों के प्रति जागरूक होना पड़ेगा।
लोकतंत्र में कानून का मूल्यांकन उसकी मंशा के साथ-साथ उसके परिणामों से किया जाता है। यदि DPDP एक्ट नागरिकों को डेटा के दुरुपयोग से बचाता है, कंपनियों को जवाबदेह बनाता है और डिजिटल सेवाओं में विश्वास बढ़ाता है, तो यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। लेकिन यदि इसके प्रावधानों की अस्पष्टता या असमान क्रियान्वयन से छोटे संस्थानों पर अनुपातहीन बोझ पड़ता है अथवा जनहित में सूचना के प्रसार को लेकर अनावश्यक भय पैदा होता है, तो इन समस्याओं की समीक्षा और समाधान भी जरूरी होगा।
अंततः सवाल डेटा संरक्षण के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने का है जिसमें नागरिक की निजता सुरक्षित रहे, संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित हो और पत्रकारिता अपनी लोकतांत्रिक भूमिका निभाती रहे। निजता की रक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र के दो आवश्यक आधार हैं। जरूरत इस बात की है कि कानून का इस्तेमाल नागरिकों को सशक्त बनाने के लिए हो, न कि उन्हें असहाय बनाने के लिए।
मिशन संदेश का संपादकीय दृष्टिकोण स्पष्ट है—डिजिटल भारत में नागरिकों का डेटा सुरक्षित होना चाहिए, लेकिन सच तक पहुंचने का रास्ता भी सुरक्षित रहना चाहिए। कानून की असली कसौटी यही है कि वह निजता की रक्षा करते हुए पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के बीच न्यायपूर्ण संतुलन कायम कर सके।
(आलेख - मोहम्मद सईद पठान चीफ एडिटर मिशन संदेश)

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