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“विशाल का अपहरण या बड़ी साजिश? चार की गिरफ्तारी ,कार में मिले 15 दस्तावेज, हत्या की कथित योजना… पुलिस के दावे पर उठे बड़े सवाल”

  • 12 घंटे में बरामदगी, चार गिरफ्तार—लेकिन पुलिस की कहानी में उठते हैं कई अहम सवाल

(By- Mohammad Sayeed Pathan Editor Mission Sandesh)

संतकबीरनगर । जनपद के बखिरा थाना क्षेत्र में युवक विशाल कुमार के कथित अपहरण और उसे अयोध्या ले जाकर हत्या किए जाने की आशंका से जुड़ा मामला पुलिस ने सुलझाने का दावा किया है। पुलिस के अनुसार विशाल कुमार को 21 सितंबर की रात करीब 2:30 बजे कांटे के पास एक अर्टिगा कार से सकुशल बरामद किया गया और चार लोगों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने कार से 42,620 रुपये, पांच मोबाइल फोन तथा विशाल के हस्ताक्षर और फोटो वाले 15 दस्तावेज बरामद होने की बात कही है।

पुलिस की कार्रवाई निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन पूरे घटनाक्रम को केवल पुलिस के दावे के आधार पर अंतिम सत्य मानने से पहले कई बिंदुओं की स्वतंत्र जांच जरूरी दिखाई देती है।

12 घंटे में बरामदगी के दावे पर पहला सवाल

पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में कार्रवाई को “12 घंटे के भीतर” की बरामदगी बताया गया है। लेकिन उसी विज्ञप्ति में शिकायतकर्ता के हवाले से कहा गया है कि विशाल को 20 सितंबर को सुबह करीब 10:30 बजे फोन कर बुलाया गया था और रात 8 बजे तक घर नहीं लौटने पर आशंका जताते हुए पुलिस को सूचना दी गई।

इसके बाद पुलिस के अनुसार 21 सितंबर की रात 2:30 बजे उसे बरामद किया गया। यानी सुबह 10:30 बजे से 2:30 बजे तक लगभग 16 घंटे और रात 8 बजे से 2:30 बजे तक लगभग 6 घंटे 30 मिनट का अंतर है।

इसलिए “12 घंटे के भीतर” वाला दावा किस समय-बिंदु से गणना करके किया गया, यह पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए। क्या प्राथमिकी दर्ज होने का समय, सूचना मिलने का समय या वास्तविक अपहरण का समय आधार बनाया गया? यह तथ्य रिकॉर्ड से स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है।

सबसे गंभीर सवाल—क्या हत्या की योजना वास्तव में थी?

पुलिस ने गिरफ्तार आरोपी विश्वकेतु यादव के कथित पूछताछ बयान का हवाला देते हुए कहा है कि विशाल को पहले सांसद के यहां ले जाकर नोटरी पर हस्ताक्षर कराए गए और फिर उसे अयोध्या ले जाकर हत्या कर शव फेंकने की योजना थी।

यह आरोप बेहद गंभीर है। लेकिन पुलिस पूछताछ में आरोपी द्वारा कही गई बात अपने आप में न्यायालय में सिद्ध अपराध नहीं होती। इस दावे की पुष्टि के लिए पुलिस को यह स्पष्ट करना होगा कि हत्या की कथित योजना के समर्थन में कौन-कौन से स्वतंत्र साक्ष्य मिले हैं—जैसे सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड, वाहन की GPS जानकारी, रास्ते के फुटेज, स्वतंत्र गवाह या अन्य फोरेंसिक साक्ष्य।

यही वह बिंदु है जहां मामले की आगे की विवेचना सबसे महत्वपूर्ण होगी।

सांसद के घर का जिक्र—जांच का संवेदनशील पहलू

शिकायत में कहा गया है कि विशाल को यह कहकर बुलाया गया था कि “सांसद जी के घर चलना है” और वहां कुछ अन्य लोगों के मिलने की बात बताई गई थी। पुलिस के अनुसार बाद में विशाल के हस्ताक्षरयुक्त और फोटो वाले दस्तावेज भी बरामद हुए।

ऐसे में सबसे बड़ा सार्वजनिक सवाल यह है कि ये दस्तावेज कहां तैयार हुए, किसके सामने हस्ताक्षर हुए, नोटरी कौन था और उस समय वहां कौन-कौन मौजूद था?

यदि पुलिस के पास इन सवालों के दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक प्रमाण हैं तो उन्हें विवेचना में सुरक्षित किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कथित दस्तावेजों पर विशाल ने अपनी इच्छा से हस्ताक्षर किए या किसी दबाव अथवा भय के कारण।

15 दस्तावेज बरामद होने का रहस्य क्या है?

पुलिस ने 15 अदद शपथपत्र, आवेदन पत्र और आधार कार्ड जैसे दस्तावेज बरामद करने की बात कही है। यह बरामदगी मामले को सामान्य अपहरण की घटना से आगे ले जाती है।

सवाल यह है कि इतने दस्तावेज एक ही व्यक्ति के पास क्यों रखे गए थे? क्या सभी दस्तावेज एक ही विषय से संबंधित हैं? क्या उन पर एक ही तारीख है? क्या इनमें किसी मुकदमे से संबंधित बयान या आवेदन हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इन दस्तावेजों का संबंध उस मुकदमे से है, जिसके कारण पुलिस के अनुसार विवाद पैदा हुआ?

इन सवालों के जवाब सामने आने पर घटना की वास्तविक पृष्ठभूमि काफी स्पष्ट हो सकती है।

धारा 140(1) भी बताती है कि पुलिस किस आरोप की जांच कर रही है

पुलिस ने मुकदमे में BNS की धारा 140(1) लगाई है। यह सामान्य अपहरण की धारा नहीं बल्कि हत्या के उद्देश्य से अपहरण या व्यक्ति को हत्या के खतरे में डालने से संबंधित गंभीर प्रावधान है।

इसलिए विवेचना में यह साबित करना महत्वपूर्ण होगा कि आरोपियों का उद्देश्य वास्तव में हत्या करना था या परिस्थितियां किसी अन्य अपराध की ओर इशारा करती हैं। गिरफ्तारी और बरामदगी अपने आप में इस आरोप का अंतिम न्यायिक प्रमाण नहीं हैं।

क्या पुलिस का दावा सही है?

पुलिस की कार्रवाई और बरामदगी को जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन उपलब्ध प्रेस विज्ञप्ति के आधार पर पूरे पुलिस दावे को अभी अंतिम रूप से सही ठहराना जल्दबाजी होगी।

फिलहाल पुलिस के दावे के पक्ष में मुख्य बातें हैं—युवक की सकुशल बरामदगी, चार आरोपियों की गिरफ्तारी, वाहन की बरामदगी और कथित दस्तावेजों की बरामदगी।

वहीं जांच की जरूरत वाले प्रमुख बिंदु हैं—

  • “12 घंटे के भीतर” बरामदगी की गणना कैसे हुई?
  • विशाल को वास्तव में किस स्थान से और किस परिस्थिति में उठाया गया?
  • सांसद के आवास पर ले जाने की बात की स्वतंत्र पुष्टि क्या है?
  • कथित नोटरी प्रक्रिया कब और कहां हुई?
  • 15 दस्तावेजों का वास्तविक स्रोत क्या है?
  • हत्या की कथित योजना के समर्थन में पुलिस के पास पूछताछ बयान के अलावा क्या साक्ष्य हैं?
  • विशाल का स्वयं का बयान क्या है और उसने घटना के संबंध में मजिस्ट्रेट के सामने क्या बताया?
  • मोबाइल लोकेशन, CCTV, कॉल डिटेल और वाहन की आवाजाही क्या पुलिस की कहानी की पुष्टि करती है?

इसलिए फिलहाल सबसे सटीक निष्कर्ष यही है कि पुलिस ने एक गंभीर मामले में त्वरित बरामदगी और गिरफ्तारी का दावा किया है, लेकिन कथित अपहरण से लेकर हत्या की योजना तक की पूरी कहानी की पुष्टि स्वतंत्र और न्यायिक साक्ष्यों से होना अभी बाकी है।

आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं; दोष सिद्ध होना न्यायालय की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

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