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शादी का झांसा देकर बनाया शारीरिक संबंध, पीड़िता को किया गर्भवती; कोर्ट ने कहा- अपराध गंभीर, जमानत नामंजूर



रिपोर्ट - मोहम्मद सईद पठान

संतकबीरनगर, 5 अगस्त 2025। जब प्रेम भरोसे की नींव पर टिका हो और कोई उस भरोसे को ठग कर छलावे में बदल दे, तो सिर्फ एक रिश्ता नहीं टूटता — टूट जाती है एक स्त्री की आत्मा, उसका आत्मसम्मान और जीवन का विश्वास। दुधारा थाना क्षेत्र की एक युवती के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, जब उसे शादी का वादा करके बार-बार शारीरिक संबंध बनाए गए और गर्भवती हो जाने पर उसे न सिर्फ ठुकरा दिया गया, बल्कि गर्भपात का दबाव भी बनाया गया।

इस अमानवीय घटना में आरोपी अलाउद्दीन ने पीड़िता से प्रेम और विवाह का झूठा वादा कर उसके साथ कई बार संबंध बनाए। जब पीड़िता गर्भवती हुई, तो उसने शादी से मुंह मोड़ लिया और उल्टा उस पर गर्भपात का दबाव बनाने लगा। इस मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से क्षुब्ध होकर युवती ने थाने में शिकायत दी, जिस पर थाना दुधारा में मुकदमा पंजीकृत किया गया और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया।

अदालत का रुख: "पीड़िता की अस्मिता के साथ खिलवाड़, आरोपी की जमानत नहीं"

आरोपी अलाउद्दीन की ओर से सत्र न्यायाधीश मोहनलाल विश्वकर्मा की अदालत में जमानत याचिका दाखिल की गई। लेकिन जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) विशाल श्रीवास्तव ने 

उसका कड़ा विरोध करते हुए स्पष्ट किया कि—

"अभियुक्त का कृत्य न केवल गंभीर प्रकृति का है, बल्कि यह एक युवती की गरिमा, उसकी भावनाओं और शारीरिक स्वतंत्रता के साथ किया गया क्रूर मज़ाक है। आरोपी यदि रिहा हुआ तो वह न सिर्फ पीड़िता को धमका सकता है, बल्कि साक्ष्य से भी छेड़छाड़ कर सकता है।"

इन तर्कों के आलोक में न्यायालय ने आरोपी की जमानत याचिका को अस्वीकार करते हुए निरस्त कर दिया।


विश्लेषण: यह महज एक आपराधिक मामला नहीं, एक सामाजिक चेतावनी है

इस तरह की घटनाएं हमारे समाज में फैली लैंगिक असमानता और स्त्री सुरक्षा के खोखले दावों की पोल खोलती हैं। जब एक महिला को प्रेम और विवाह के नाम पर बहला-फुसलाकर शारीरिक संबंध बनाने के बाद गर्भवती कर छोड़ दिया जाता है, तो यह केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की असफलता का दर्पण है।

  • शादी का प्रलोभन देकर शोषण करना न सिर्फ कानूनन अपराध है, बल्कि नैतिक रूप से भी निंदनीय है।

  • गर्भवती स्त्री पर दबाव बनाना कि वह गर्भपात कर ले, उसके जीवन के साथ मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

  • और जब इस कृत्य के बाद भी आरोपी जमानत की उम्मीद करता है, तो यह न्याय व्यवस्था की गंभीर परीक्षा बन जाती है।

पीड़िता के हक में न्याय: एक जरूरी सख्ती

सत्र न्यायालय द्वारा इस प्रकरण में जमानत याचिका खारिज करना एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश है — कि

"किसी की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर, उसके जीवन को बर्बाद करने वाले को कानून बख्शेगा नहीं।"

यह फैसला न केवल पीड़िता के लिए न्याय की पहली सीढ़ी है, बल्कि ऐसे कई मामलों में न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता और सख्ती का भी प्रतीक है।


निष्कर्ष:

समाज को यह समझना होगा कि प्रेम और विवाह के नाम पर शोषण किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और निर्णय का सम्मान न करने वाले को न कानून माफ करेगा, न समाज।

इस फैसले से उम्मीद है कि यह मामला महज कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का माध्यम बनेगा — ताकि कोई भी युवती फिर इस छलावे का शिकार न बने।

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