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मिस-सेलिंग पर बीमा कंपनी को बड़ा झटका: उपभोक्ता आयोग ने पॉलिसी निरस्त कर 10.45 लाख रुपये ब्याज सहित लौटाने का दिया आदेश



अशोका हॉस्पिटल के चिकित्सक की शिकायत पर फैसला, 

मानसिक व आर्थिक क्षति के लिए 60 हजार रुपये अतिरिक्त 

देने के निर्देश

(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)

संतकबीरनगर। बीमा पॉलिसियों की भ्रामक बिक्री (मिस-सेलिंग) के मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, संतकबीरनगर ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। आयोग ने टाटा एआईए लाइफ इंश्योरेंस के विरुद्ध दायर वाद में बीमा कंपनी को पॉलिसी निरस्त करते हुए शिकायतकर्ता से वसूली गई 10.45 लाख रुपये की प्रीमियम राशि 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने तथा 60 हजार रुपये क्षतिपूर्ति के रूप में अदा करने का आदेश दिया है।

यह मामला शहर के अशोका हॉस्पिटल से जुड़े चिकित्सक डॉ. अशोक कुमार द्वारा दायर परिवाद से संबंधित है।

जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार सिंह एवं महिला सदस्य संतोष की पीठ ने दोनों पक्षों के तर्क, दस्तावेजी साक्ष्यों और अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद यह फैसला सुनाया।

एकल प्रीमियम बताकर बेची गई बहुवर्षीय पॉलिसी का आरोप

वाद के अनुसार, 21 दिसंबर 2022 को बीमा कंपनी के अधिकृत प्रतिनिधि अशोका हॉस्पिटल पहुंचे और 'स्मार्ट संपूर्ण रक्षा प्लान' के तहत 75 लाख रुपये के मैच्योरिटी बेनिफिट का दावा करते हुए पॉलिसी खरीदने के लिए प्रेरित किया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्हें यह पॉलिसी सिंगल प्रीमियम योजना बताकर बेची गई, जबकि बाद में अतिरिक्त प्रीमियम जमा करने की बाध्यता सामने आई।

परिवादी का यह भी आरोप था कि प्रस्ताव प्रपत्र (प्रपोजल फॉर्म) में कई त्रुटियां थीं, उन पर विधिवत हस्ताक्षर नहीं कराए गए और पॉलिसी बॉन्ड फ्री-लुक पीरियड समाप्त होने के बाद भेजा गया। इसके कारण वह निर्धारित अवधि के भीतर पॉलिसी निरस्त नहीं करा सके और उन्हें अगले वर्ष का प्रीमियम भी जमा करना पड़ा।

इस प्रकार उन्होंने कुल 10 लाख 45 हजार रुपये प्रीमियम के रूप में जमा किए।

बीमा कंपनी ने नहीं लौटाई राशि, आयोग की शरण में पहुंचे उपभोक्ता

शिकायतकर्ता ने वर्ष 2024 में बीमा कंपनी से जमा प्रीमियम वापस करने की मांग की, लेकिन सकारात्मक कार्रवाई न होने पर अद्विक लीगल कंसल्टेंसी के माध्यम से जिला उपभोक्ता आयोग में वाद दायर किया।

सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया कि जिस सर्विसिंग एजेंट अथवा इंश्योरेंस ब्रोकर का नाम अभिलेखों में दर्ज है, उनसे उनकी कभी मुलाकात तक नहीं हुई।

60 दिनों में भुगतान का आदेश

आयोग ने अपने आदेश में बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि शिकायतकर्ता को जमा की गई 10.45 लाख रुपये की राशि 11 जनवरी 2024 से अंतिम भुगतान तक 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित 60 दिनों के भीतर लौटाई जाए। इसके अतिरिक्त मानसिक एवं आर्थिक उत्पीड़न के लिए 60 हजार रुपये क्षतिपूर्ति भी अदा की जाए।

हमारी समीक्षा: उपभोक्ताओं के अधिकारों को मिला महत्वपूर्ण संरक्षण

जिला उपभोक्ता आयोग का यह निर्णय केवल एक उपभोक्ता को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि बीमा क्षेत्र में बढ़ती 'मिस-सेलिंग' की प्रवृत्ति पर भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। कई बार उपभोक्ताओं को योजनाओं के लाभ तो विस्तार से बताए जाते हैं, लेकिन उनकी शर्तों, जोखिमों और प्रीमियम संरचना की पूरी जानकारी नहीं दी जाती। इससे बाद में आर्थिक नुकसान और कानूनी विवाद की स्थिति पैदा होती है।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि यदि किसी बीमा पॉलिसी की बिक्री भ्रामक जानकारी, अधूरी प्रक्रिया या उपभोक्ता की स्पष्ट सहमति के बिना की जाती है, तो उपभोक्ता आयोग ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर उपभोक्ता को न्याय दिला सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय बीमा कंपनियों के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।

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