(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)
बस्ती/मुंबई। बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर घर से हजारों किलोमीटर दूर मुंबई गए एक परिवार की जिंदगी पल भर में मलबे के नीचे दफन हो गई। मुंबई में लगातार हो रही भारी बारिश के बीच मकान ढहने से उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक ही परिवार के पांच सदस्यों की दर्दनाक मौत हो गई। यह हादसा केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि महानगरों में रहने वाले लाखों प्रवासी मजदूरों की असुरक्षित जिंदगी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बस्ती जिले के पुरानी बस्ती थाना क्षेत्र के रसूलपुर गांव (चौकिया टोला) का यह परिवार रोजगार की तलाश में मुंबई के मंडाला, मानखुर्द इलाके में रहकर मजदूरी करता था। वर्षों से बेहतर जीवन के सपने संजो रहा परिवार प्रकृति के कहर और कमजोर आवासीय व्यवस्था का शिकार बन गया।
हादसे में अख्तर जहां, उनकी बेटियां कैसर जहां और अनाबिया, तथा बेटे जलालुद्दीन और सिराजुद्दीन की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि भारी बारिश के बीच मकान अचानक भरभराकर गिर पड़ा और पूरा परिवार मलबे में दब गया। राहत एवं बचाव दल ने काफी प्रयास किए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
घटना की सूचना जैसे ही बस्ती के रसूलपुर गांव पहुंची, पूरे इलाके में मातम छा गया। गांव की गलियां, जहां कभी इस परिवार के बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, अब सन्नाटे और आंसुओं से भर गई हैं। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, जबकि ग्रामीणों की आंखें भी नम हैं। हर कोई यही कह रहा है कि रोजी-रोटी की तलाश में गया परिवार अब कभी वापस नहीं लौटेगा।
सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, व्यवस्था पर भी सवाल
यह हादसा केवल भारी बारिश का परिणाम मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं होगा। यह घटना महानगरों में रहने वाले प्रवासी मजदूरों की बदहाल आवासीय स्थिति को भी उजागर करती है। आर्थिक मजबूरियों के कारण लाखों श्रमिक ऐसे जर्जर और जोखिम भरे मकानों में रहने को विवश हैं, जहां हर मानसून उनके लिए मौत का खतरा लेकर आता है।
विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि बारिश प्रभावित क्षेत्रों में पुराने और कमजोर भवनों का समय रहते सर्वेक्षण, मरम्मत या खाली कराना जरूरी है। इसके बावजूद हर वर्ष ऐसे हादसे सामने आते हैं, जिनमें सबसे अधिक कीमत गरीब और मजदूर परिवारों को चुकानी पड़ती है।
अब सबसे बड़ा सवाल...
क्या इस हादसे के बाद प्रवासी मजदूरों के लिए सुरक्षित आवास की दिशा में कोई ठोस पहल होगी? क्या ऐसे जर्जर भवनों की समय पर पहचान और कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी? या फिर यह त्रासदी भी कुछ दिनों की चर्चा बनकर फाइलों में दब जाएगी?
फिलहाल बस्ती का रसूलपुर गांव अपने पांच अपनों को खोने के गहरे दुख में डूबा है। यह हादसा याद दिलाता है कि दो वक्त की रोटी की तलाश में घर छोड़ने वाले लाखों मजदूर केवल आर्थिक संघर्ष ही नहीं, बल्कि हर दिन जीवन और मौत के बीच भी जी रहे हैं।

Post a Comment