यह ट्रेन पारंपरिक इलेक्ट्रिक ट्रेनों की तरह ओवरहेड बिजली लाइनों पर निर्भर नहीं है। इसमें हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक का उपयोग किया गया है, जिसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रक्रिया से बिजली उत्पन्न होती है। इस प्रक्रिया में केवल पानी की भाप और ऊष्मा निकलती है, जिससे प्रदूषण लगभग नगण्य रहता है। यही कारण है कि इसे पर्यावरण-अनुकूल और भविष्य की रेल तकनीक माना जा रहा है।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार ट्रेन में हाइड्रोजन रिसाव, अत्यधिक तापमान, आग और धुएं का पता लगाने के लिए अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणालियां स्थापित की गई हैं। ट्रेन की परिचालन गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है, जबकि इसकी डिजाइन गति 110 किलोमीटर प्रति घंटा है।
भारत की यह हाइड्रोजन ट्रेन 10 डिब्बों वाली है और इसमें लगभग 2,600 यात्रियों के सफर की क्षमता है। इस आधार पर इसे दुनिया की सबसे बड़ी हाइड्रोजन ट्रेन बताया जा रहा है। इसके संचालन के लिए जींद में देश का सबसे बड़ा रेलवे हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग प्लांट भी स्थापित किया गया है, जहां ट्रेन में ईंधन भरने की आधुनिक व्यवस्था उपलब्ध है।
दुनिया में हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन अभी शुरुआती चरण में है। जर्मनी इस तकनीक को अपनाने वाला पहला देश रहा, जबकि फ्रांस, इटली, चीन और जापान भी इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। हालांकि इन देशों में संचालित हाइड्रोजन ट्रेनों में सामान्यतः दो से चार डिब्बे ही होते हैं, जबकि भारत ने 10 डिब्बों वाली ट्रेन के साथ इस क्षेत्र में नया मानक स्थापित किया है।
रेल मंत्रालय के अनुसार भविष्य में कालका–शिमला हेरिटेज रेलमार्ग सहित अन्य चुनिंदा मार्गों पर भी हाइड्रोजन ट्रेनों के संचालन की योजना है। पिछले एक दशक में भारतीय रेलवे ने तेज़ी से विद्युतीकरण किया है और वर्तमान में 99 प्रतिशत से अधिक ब्रॉड गेज रेलमार्ग विद्युत आधारित हो चुके हैं। ऐसे में हाइड्रोजन तकनीक रेलवे को पूरी तरह हरित और टिकाऊ परिवहन प्रणाली की ओर ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।



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