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कहां हैं सपा के सैकड़ों विधायक और सांसद, आजम ख़ान की यूनिवर्सिटी मामले में इन्हें परखने का समय आ चुका है।



(आलेख मोहम्मद सईद पठान)

जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर चल रहा विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। यह मामला केवल एक विश्वविद्यालय या एक राजनीतिक व्यक्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस सवाल से भी जुड़ा है कि जब किसी बड़े शैक्षणिक संस्थान पर संकट के दावे किए जाते हैं, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका क्या होनी चाहिए।

समाजवादी पार्टी आज उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। उसके पास विधानसभा और संसद, दोनों सदनों में उल्लेखनीय संख्या बल है। ऐसे में यदि पार्टी यह मानती है कि जौहर यूनिवर्सिटी के साथ अन्याय हो रहा है या उसके अस्तित्व पर संकट है, तो केवल प्रेस विज्ञप्तियों, सोशल मीडिया पोस्ट और राजनीतिक बयानबाज़ी से आगे बढ़कर संवैधानिक और लोकतांत्रिक संघर्ष का रास्ता अपनाना चाहिए। सदन में मुद्दा उठाना, न्यायिक प्रक्रिया में उचित पैरवी करना, जनमत तैयार करना और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों के माध्यम से अपनी बात रखना विपक्ष की स्वाभाविक जिम्मेदारी है।

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी कार्रवाई की वैधता का अंतिम निर्णय न्यायालय और कानून के दायरे में ही होना चाहिए। यदि सरकारी कार्रवाई नियमों के अनुरूप है तो उसका सम्मान होना चाहिए, और यदि किसी पक्ष को उसमें त्रुटि या अन्याय दिखाई देता है तो उसके लिए भी संवैधानिक उपाय उपलब्ध हैं। लोकतंत्र की ताकत इसी संतुलन में निहित है।

इस पूरे घटनाक्रम में रामपुर के जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी चर्चा का विषय है। जनता यह जानना चाहती है कि उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे पर क्या पहल की, कौन-से प्रयास किए और उनकी प्राथमिकताएँ क्या रहीं। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही केवल चुनावी भाषणों से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में उनके सक्रिय हस्तक्षेप से तय होती है।

जौहर यूनिवर्सिटी समर्थकों के लिए यह एक शैक्षणिक संस्थान से बढ़कर सामाजिक और शैक्षिक आकांक्षाओं का प्रतीक है। वहीं, सरकार का पक्ष कानून के अनुपालन और प्रशासनिक कार्रवाई पर आधारित है। ऐसे में आवश्यक है कि पूरा विमर्श तथ्यों, कानून और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर आगे बढ़े, न कि केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहे।

अंततः यह समय राजनीतिक लाभ-हानि का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व निभाने का है। सत्ता हो या विपक्ष—दोनों का मूल्यांकन इस बात से होगा कि उन्होंने कानून का सम्मान करते हुए जनता के हितों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए कितनी गंभीरता से अपनी भूमिका निभाई। इतिहास केवल घटनाओं को नहीं, बल्कि उन पर नेताओं की प्रतिक्रिया और जिम्मेदारी को भी दर्ज करता है।

(लेखक मिशन संदेश समाचार पत्र के मुख्य संपादक हैं)

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