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सीआरसी गोरखपुर में समावेशन पर मंथन: दिव्यांगजनों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बदलेगी सोच और व्यवस्था


(By- Mohammad Sayeed Pathan Editor Mission Sandesh)

गोरखपुर। दिव्यांगजनों और शिक्षा से वंचित लोगों को समाज एवं शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से सीआरसी गोरखपुर में ‘समावेशन की अवधारणा’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय ऑफलाइन सीआरई कार्यक्रम का मंगलवार को  समापन हुआ। कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने समावेशी शिक्षा की अवधारणा, इसकी आवश्यकता, व्यावहारिक चुनौतियों तथा सफल समावेशन के लिए आवश्यक प्रयासों और नीतिगत प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम में बतौर रिसोर्स पर्सन राजेश कुमार, राजेश कुमार यादव, विजय गुप्ता, अरविंद पांडे, संध्या सिंह, नागेंद्र पांडे एवं मंजेश कुमार ने प्रतिभागियों को समावेशन के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि समावेशन का उद्देश्य केवल दिव्यांगजनों को सामान्य संस्थानों में स्थान उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना है, जहां उनकी जरूरतों के अनुरूप सुविधाएं, अवसर और सम्मानजनक सहभागिता सुनिश्चित हो सके।

कागजों से निकलकर जमीन पर लागू होना जरूरी

कार्यक्रम के दौरान यह महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आया कि समावेशन की नीतियां और योजनाएं बनने के बाद उनका वास्तविक लाभ लक्षित वर्ग तक किस हद तक पहुंच रहा है। केवल किसी संस्था को ‘समावेशी’ घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए भवन, शिक्षण व्यवस्था, संचार, प्रशिक्षण, संसाधन और संस्थागत सोच—सभी स्तरों पर बदलाव की आवश्यकता होती है।

सीआरसी गोरखपुर के निदेशक जितेंद्र यादव ने कहा कि समावेशन केवल कागजों तक सीमित अवधारणा नहीं होनी चाहिए। इसके लिए लोगों को अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा और संस्थाओं के वातावरण को बाधामुक्त बनाना होगा, ताकि दिव्यांगजनों तथा शिक्षा से वंचित लोगों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके।

उनके अनुसार, किसी भी समावेशी व्यवस्था की सफलता इस बात से तय होगी कि दिव्यांग व्यक्ति को संस्थान तक पहुंचने, वहां सीखने, अपनी बात रखने और उपलब्ध अवसरों में समान रूप से भाग लेने में कितनी आसानी होती है।

सुगम भवन के साथ सुगम सोच भी जरूरी

सीआरसी गोरखपुर के निदेशक ने बताया कि सीआरसी गोरखपुर का भवन पूरी तरह सुगम्य है और सामान्य एवं दिव्यांगजनों की पहुंच के अनुकूल है। हालांकि, समावेशन के व्यापक लक्ष्य को देखते हुए केवल भौतिक सुगमता ही पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। भवन तक पहुंच के साथ-साथ सूचना, संचार, शिक्षण सामग्री और सेवाओं तक समान पहुंच भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

यही वह बिंदु है जहां समावेशन की अवधारणा को व्यवहार में लागू करने की वास्तविक चुनौती सामने आती है। संस्थानों में रैंप, सुगम शौचालय या अन्य भौतिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि वहां कार्यरत कर्मचारियों और शिक्षकों को दिव्यांगजनों की विविध आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील एवं प्रशिक्षित किया जाए।

प्रशिक्षण से बढ़ सकती है समावेशी व्यवस्था की प्रभावशीलता

दो दिवसीय सीआरई कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को समावेशन से जुड़े व्यावहारिक एवं नीतिगत पहलुओं से परिचित कराना रहा। विशेषज्ञों ने समावेशन के अर्थ और आवश्यकता के साथ-साथ सफल समावेशन के लिए किए जाने वाले प्रयासों पर चर्चा की।

इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों की उपयोगिता इसी बात में है कि प्रशिक्षण में मिली जानकारी को संस्थानों और समुदाय के स्तर पर किस तरह लागू किया जाता है। यदि प्रशिक्षित प्रतिभागी अपने-अपने कार्यक्षेत्र में समावेशी वातावरण विकसित करने के लिए पहल करते हैं, तो ऐसे कार्यक्रमों का प्रभाव व्यापक हो सकता है।

कार्यक्रम में कुल 23 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का संचालन नागेंद्र पांडे ने किया।

बड़ा सवाल: क्या हर संस्था वास्तव में समावेशी है?

कार्यक्रम के समापन के साथ समावेशन को लेकर एक व्यापक सवाल भी महत्वपूर्ण है—क्या केवल नीतियां और प्रशिक्षण पर्याप्त हैं, या प्रत्येक शिक्षण एवं सार्वजनिक संस्था में उनकी नियमित समीक्षा भी जरूरी है? दिव्यांगजनों के लिए सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद यदि उन्हें व्यवहारिक स्तर पर कठिनाइयों का सामना करना पड़े, तो समावेशन का उद्देश्य अधूरा रह सकता है।

ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि समावेशन को किसी एक कार्यक्रम या अभियान तक सीमित न रखकर संस्था की नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाया जाए। भवन की सुगमता, प्रशिक्षित मानव संसाधन, सहायक उपकरण, सुलभ शिक्षण सामग्री, संचार की सुविधा और समान अवसर—इन सभी मानकों की समय-समय पर समीक्षा ही समावेशी व्यवस्था को मजबूत कर सकती है।

सीआरसी गोरखपुर में आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम ने कम से कम इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाने का अवसर दिया है। अब इसकी वास्तविक सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि यहां से प्राप्त प्रशिक्षण और विचार कितने प्रभावी ढंग से जमीनी स्तर पर लागू होते हैं और दिव्यांगजनों तथा शिक्षा से वंचित लोगों के लिए वास्तविक अवसरों में कितना बदलाव आता है।

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