सीआरसी गोरखपुर की मधुमेह से जुड़ी जटिलताओं के समाधान की दिशा में सार्थक पहल, दो दिवसीय सीआरई कार्यक्रम का सफल समापन
गोरखपुर। दिव्यांगजन पुनर्वास एवं स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की दिशा में कार्यरत सीआरसी गोरखपुर में आयोजित दो दिवसीय ऑफलाइन सतत पुनर्वास शिक्षा (सीआरई) कार्यक्रम का बुधवार को सफल समापन हो गया। “मधुमेह से पीड़ित व्यक्तियों के पैर के ऑर्थोसिस प्रबंधन” विषय पर केंद्रित इस कार्यक्रम में प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए पुनर्वास पेशेवरों ने भाग लेकर अपने ज्ञान और कौशल का विस्तार किया।
समापन सत्र में बतौर रिसोर्स पर्सन फिजियोथैरेपी विभाग के प्रवक्ता डॉ. विजय गुप्ता, श्री नागेंद्र पांडेय तथा पी एंड ओ विभाग की विशेषज्ञ सुश्री कंचन चौधरी ने मधुमेह से प्रभावित पैरों की विकृतियों के उपचार और प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मधुमेह के कारण पैरों में होने वाली जटिलताएं समय पर पहचान और उचित प्रबंधन के अभाव में गंभीर रूप धारण कर सकती हैं। ऐसे में फिजियोथैरेपी और प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स (पी एंड ओ) सेवाएं मरीजों को बेहतर जीवन गुणवत्ता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि उचित व्यायाम, चिकित्सकीय परामर्श और सहायक उपकरणों के उपयोग से मरीजों की गतिशीलता में सुधार लाया जा सकता है तथा संभावित जटिलताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि सीआरसी गोरखपुर द्वारा दिव्यांगजनों को ये सेवाएं पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को भी लाभ मिल सके।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर सीआरसी गोरखपुर के निदेशक श्री जितेंद्र यादव ने प्रतिभागियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि पुनर्वास क्षेत्र में प्रशिक्षित मानव संसाधन की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए संस्थान भविष्य में भी ऐसे ऑनलाइन एवं ऑफलाइन सीआरई कार्यक्रमों का नियमित आयोजन करेगा। उन्होंने कहा कि नवीन तकनीकों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम पुनर्वास सेवाओं की गुणवत्ता को सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध होंगे।
गौरतलब है कि भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआई) में पंजीकृत पुनर्वास व्यवसायिकों के लिए अपने पंजीकरण प्रमाण-पत्र के नवीनीकरण हेतु सीआरई कार्यक्रमों में सहभागिता अनिवार्य होती है। ऐसे में यह आयोजन न केवल औपचारिक आवश्यकता की पूर्ति करता है, बल्कि पुनर्वास क्षेत्र में कार्यरत पेशेवरों को नवीनतम ज्ञान और व्यावहारिक अनुभव से भी समृद्ध करता है। यह कार्यक्रम स्वास्थ्य और पुनर्वास सेवाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में एक सार्थक पहल के रूप में देखा जा रहा है।
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