(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)
संतकबीरनगर। उत्तर प्रदेश गो-सेवा आयोग के उपाध्यक्ष महेश कुमार शुक्ल ने शुक्रवार को कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित गो-संरक्षण एवं अनुश्रवण मूल्यांकन समिति की समीक्षा बैठक में जनपद की गोशालाओं और गोवंश संरक्षण की व्यवस्थाओं का विस्तृत जायजा लिया। बैठक में जिलाधिकारी आलोक कुमार, पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार मीना, मुख्य विकास अधिकारी जयकेश त्रिपाठी समेत विभिन्न विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।
समीक्षा के दौरान अधिकारियों ने बताया कि जनपद में वर्तमान में 12 गो-आश्रय स्थल संचालित हैं, जिनमें 1,369 गोवंश संरक्षित हैं। हैंसर बाजार क्षेत्र में लगभग 200 गोवंश क्षमता वाली नई कान्हा गोशाला भी स्थापित की गई है। तीन गो-आश्रय स्थलों का संचालन एनजीओ को सौंपा गया है, जिस पर आयोग के उपाध्यक्ष ने स्पष्ट निर्देश दिए कि किसी भी संस्था को जिम्मेदारी सौंपने से पहले उसके कार्यों की गुणवत्ता, वित्तीय पारदर्शिता और क्षमता का गंभीर मूल्यांकन किया जाए।
बैठक में गोशालाओं में सीसीटीवी की सक्रियता, हरे चारे की उपलब्धता, स्वच्छ पेयजल, आइसोलेशन वार्ड, गोचर भूमि के संरक्षण, नियमित चिकित्सकीय देखभाल, टैगिंग, टीकाकरण और रिकॉर्ड संधारण को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश दिए गए। उन्होंने सभी नोडल अधिकारियों को प्रत्येक सप्ताह गोशालाओं का स्थलीय निरीक्षण करने और कमियों को तत्काल दूर कराने के निर्देश भी दिए।
प्रेस वार्ता में महेश कुमार शुक्ल ने कहा कि प्रदेश सरकार गो-सेवा को केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दायित्व के रूप में देख रही है। उन्होंने कहा कि गोवंश संरक्षण के लिए सरकार कई योजनाएं संचालित कर रही है और गो-तस्करी के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जा रही है। उनका कहना था कि "गोमाता की सेवा से हमारे संस्कार और संस्कृति की रक्षा होगी।"
हालांकि, समीक्षा बैठकों और निर्देशों के बीच सबसे बड़ा सवाल इनके वास्तविक क्रियान्वयन का है। प्रदेश के विभिन्न जिलों में समय-समय पर गोशालाओं में चारे की कमी, बीमार गोवंश, रखरखाव में लापरवाही और वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में केवल समीक्षा बैठकें आयोजित करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि नियमित निगरानी, पारदर्शी व्यवस्था और जवाबदेही तय करना भी उतना ही आवश्यक है।
यदि प्रशासनिक निर्देशों का प्रभावी पालन सुनिश्चित होता है और गो-आश्रय स्थलों की व्यवस्थाओं में वास्तविक सुधार दिखाई देता है, तभी गो-संरक्षण की योजनाएं अपने उद्देश्य को सार्थक कर सकेंगी और सरकार की मंशा धरातल पर सफल होती नजर आएगी।


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