'ऑपरेशन कन्विक्शन' के तहत पुलिस की प्रभावी पैरवी रंग लाई
(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)
संतकबीरनगर। जनपद में लंबित गंभीर आपराधिक मामलों के शीघ्र निस्तारण के उद्देश्य से चलाए जा रहे "ऑपरेशन कन्विक्शन" अभियान के तहत संतकबीरनगर पुलिस को एक और महत्वपूर्ण सफलता मिली है। वर्ष 2016 के गैर इरादतन हत्या (कुलपेबल होमिसाइड) के मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय ने तीन अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए 7-7 वर्ष के साधारण कारावास तथा कुल 33 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है।
पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार मीना के निर्देशन में गुणवत्तापूर्ण विवेचना और अभियोजन पक्ष की प्रभावी पैरवी के परिणामस्वरूप जिला एवं सत्र न्यायाधीश रणधीर सिंह की अदालत ने थाना महुली के राजाराम, बीरबल और सरोज देवी को दोषसिद्ध कर दंडित किया।
क्या था मामला?
अभियोजन के अनुसार, 20 मई 2016 को थाना महुली क्षेत्र के नगुआ गांव निवासी दुर्जन ने तहरीर देकर आरोप लगाया था कि तीनों अभियुक्तों ने उनके चाचा झगरू के साथ लाठी-डंडों से मारपीट की थी। गंभीर रूप से घायल झगरू की उपचार के दौरान मृत्यु हो गई थी। मामले में पुलिस ने साक्ष्य संकलित कर आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया था।
न्यायालय ने तीनों दोषियों को धारा 304/34 भारतीय दंड संहिता के तहत 7-7 वर्ष के साधारण कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माने तथा धारा 323/34 के तहत 6-6 माह के साधारण कारावास एवं 1-1 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना अदा न करने पर अतिरिक्त कारावास का भी प्रावधान किया गया है।
समीक्षात्मक दृष्टि
यह फैसला दर्शाता है कि यदि विवेचना निष्पक्ष, साक्ष्य मजबूत और अभियोजन प्रभावी हो, तो वर्षों पुराने मामलों में भी न्याय संभव है। हालांकि, यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि 2016 में दर्ज इस मुकदमे का अंतिम फैसला आने में लगभग 10 वर्ष लग गए। न्याय मिला, लेकिन इतनी लंबी न्यायिक प्रक्रिया पीड़ित परिवारों के लिए निश्चित रूप से कठिन और मानसिक रूप से पीड़ादायक रही होगी।
'ऑपरेशन कन्विक्शन' के तहत पुलिस लगातार दोषसिद्धि दर बढ़ाने का दावा कर रही है, जो सकारात्मक संकेत है। लेकिन केवल सजा दिलाना ही पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की भी है कि गंभीर आपराधिक मामलों की विवेचना समयबद्ध, वैज्ञानिक और निष्पक्ष हो तथा न्यायालयों में लंबित मुकदमों का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित किया जाए।
कानून का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब अपराध के बाद न्याय मिलने में वर्षों नहीं, बल्कि यथासंभव कम समय लगे। तभी पीड़ितों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास और अपराधियों में कानून का भय दोनों मजबूत होंगे।

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