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डेयरी विकास के 50 वर्ष: योजनाओं के विस्तार का दावा, लेकिन जमीनी चुनौतियां अब भी बरकरार



(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)

संतकबीरनगर। दुग्धशाला विकास विभाग के स्थापना के 50 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर बुधवार को विकास भवन स्थित डीपीआरसी सभागार में जनपद स्तरीय डेयरी कॉन्क्लेव-2026 का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभागीय अधिकारियों ने दुग्ध उत्पादन बढ़ाने, पशुपालकों की आय में वृद्धि तथा सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया। साथ ही मुख्यमंत्री स्वदेशी गो-संवर्धन योजना के अंतर्गत चयनित 28 लाभार्थियों को चयन पत्र भी वितरित किए गए।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। वरिष्ठ दुग्ध निरीक्षक एवं नोडल अधिकारी सतीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने दुग्ध क्षेत्र में लगभग 1,000 करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य निर्धारित किया है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक गांव में दुग्ध सहकारी समितियों का गठन कर किसानों को गांव स्तर पर ही दूध के उचित मूल्य की व्यवस्था उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने नन्द बाबा दुग्ध मिशन, तकनीकी निवेश योजना, सहकारी समितियों के पुनर्गठन और कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रमों की भी जानकारी दी।

राजकीय दुग्ध पर्यवेक्षक विन्दर सिंह ने आधुनिक डेयरी प्रबंधन, चारा विकास, दुग्ध प्रसंस्करण तथा विभागीय योजनाओं की जानकारी दी। वहीं मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. एस.के. तिवारी ने पशु रोगों की रोकथाम, टीकाकरण और स्वास्थ्य प्रबंधन को डेयरी व्यवसाय की सफलता का आधार बताया।

कार्यक्रम में उपायुक्त श्रम एवं रोजगार प्रभात द्विवेदी ने पशुपालकों से सरकारी योजनाओं का अधिकाधिक लाभ उठाने की अपील की। इस अवसर पर मुख्यमंत्री स्वदेशी गो-संवर्धन योजना के तहत ई-लॉटरी से चयनित 14 महिला एवं 14 पुरुष लाभार्थियों को चयन पत्र प्रदान किए गए।

समीक्षात्मक दृष्टि

दुग्धशाला विकास विभाग के 50 वर्ष पूरे होने पर आयोजित यह कॉन्क्लेव सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को सामने लाने का मंच बना, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इन योजनाओं का लाभ वास्तव में गांव-गांव के छोटे और सीमांत पशुपालकों तक प्रभावी ढंग से पहुंच पा रहा है?

आज भी बड़ी संख्या में दुग्ध उत्पादकों को दूध का लाभकारी मूल्य, समय पर भुगतान, गुणवत्तापूर्ण पशु चिकित्सा सेवाएं, संतुलित पशु आहार और संगठित विपणन व्यवस्था जैसी मूलभूत समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई स्थानों पर दुग्ध सहकारी समितियां या तो निष्क्रिय हैं या अपेक्षित क्षमता से काम नहीं कर रही हैं।

यदि सरकार का लक्ष्य प्रदेश को दुग्ध उत्पादन में अग्रणी बनाए रखना है, तो केवल योजनाओं की घोषणा और सम्मेलन आयोजित करना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यक है कि योजनाओं की जमीनी मॉनिटरिंग, पारदर्शी क्रियान्वयन, दुग्ध संग्रहण नेटवर्क का विस्तार और किसानों को समयबद्ध आर्थिक लाभ सुनिश्चित किया जाए।

डेयरी कॉन्क्लेव तभी सार्थक माना जाएगा, जब इसके परिणाम स्वरूप छोटे पशुपालकों की आय में वास्तविक वृद्धि दिखाई दे और सरकारी योजनाएं कागजों से निकलकर गांवों की डेयरियों तक प्रभावी रूप से पहुंचें।

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