न्यूयॉर्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को न्यूयॉर्क में एक सम्मेलन में कहा कि जो हिंदू यह मानता है कि मुसलमानों को भारत से "बाहर निकाल देना चाहिए", वह हिंदू नहीं रह सकता।
उन्होंने कहा कि मानवता की एकता की हिंदू अवधारणा में इस तरह किसी को बाहर करने की कोई जगह नहीं है।
न्यूयॉर्क में आयोजित अहेड फोरम की ओर से आयोजित फेथ लीडर्स कॉन्फ्रेंस में भागवत ने कहा कि सामाजिक और धार्मिक संगठन सार्वजनिक नीतियों और राजनीति को प्रभावित करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इसकी शुरुआत समाज से करनी होगी, क्योंकि "राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है।"
मोहन भागवत के इस बयान पर राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रिया आई है। इन लोगों का कहना है कि भागवत जो कह रहे हैं, उस पर देश में अमल भी होना चाहिए।
मोहन भागवत का यह कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही विवादों से घिर गया था, क्योंकि न्यूयॉर्क सिटी के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने सार्वजनिक तौर पर इस कार्यक्रम का विरोध किया था। उन्होंने आरएसएस की विचारधारा को बहिष्कारवादी और न्यूयॉर्क शहर के बहुलतावादी विचारों के उलट बताया था।
मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा कि अतीत की 'विरासत' ने समुदायों के बीच तनाव पैदा करने में भूमिका निभाई है
संघ प्रमुख ने अपने भाषण के दौरान कहा, "एक बार मुस्लिमों ने एक बातचीत के दौरान मुझसे हिंदू राष्ट्र के आरएसएस के विचार के बारे में पूछा था। उन्होंने कहा था कि क्या इसके मुताबिक़ मुस्लिमों को देश से भगा दिया जाएगा। मैंने कहा कि नहीं, ये हिंदुत्व नहीं है। अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए तो वो फिर हिंदू नहीं रह जाता है।"
उन्होंने कहा, "जब हम यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका कहते हैं तो एक शब्द की काफ़ी चर्चा की जाती है और वो है बहुलता। और जब हम भारत कहते हैं तो एक और शब्द की चर्चा की जाती है और वो है-यूनिटी इन डायवर्सिटी। ये यूनिटी और डायवर्सिटी दोनों भारत के डीएनए में है।"
उन्होंने कहा, "अगर आप खुद को हिंदू कहलाना चाहते हैं, तो आपको यह मानना होगा कि सभी रास्ते एक ही ईश्वर तक पहुंचते हैं। और हर इंसान का सम्मान और गरिमा है। इंसानों में कोई भेद नहीं है।"
भागवत ने कहा कि हिंदू परंपरा में यह माना जाता है कि सभी धर्म अंततः ईश्वर की खोज की ओर ले जाते हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से उन अलग-अलग धर्मों के लोगों को शरण दी है, जिन्हें कहीं और सुरक्षा नहीं मिली।
हालांकि, उन्होंने कहा कि अतीत की "विरासत" ने समुदायों के बीच तनाव पैदा करने में भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा कि आरएसएस की जिम्मेदारी है कि वह यह विचार समाज तक पहुंचाए कि विविधता के बावजूद सभी के बीच एक मूलभूत एकता है।
उन्होंने कहा, "जिस तरह मैं अपनी विशिष्ट पहचान की रक्षा करता हूं, उसी तरह मुझे दूसरों की पहचान की भी रक्षा करनी चाहिए। विविधता प्रकृति का नियम है। एकता प्रकृति के पीछे का सत्य है।"
भागवत कहा, "हम नीतियों को प्रभावित करना चाहते हैं। हम युद्ध रोकना चाहते हैं। इसलिए हम राजनीति को प्रभावित करना चाहते हैं। लेकिन हम शुरुआत वहीं से नहीं कर सकते। राजनीति अब स्वार्थ का खेल बन गई है। जहां 'मैं और मेरा' होता है, वहां कोई समाधान नहीं होता। 'हम और हमारा' ही समाधान है।"
भागवत ने हरियाणा के ऊपर दो विमानों की टक्कर की घटना का जिक्र किया। यह 1996 में सऊदी एयरलाइंस के एक विमान और कजाख़स्तान एयरलाइंस के विमान के बीच हुई टक्कर थी। उन्होंने कहा कि आरएसएस के कार्यकर्ता सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचने वालों में शामिल थे और उन्होंने घायलों की मदद की। साथ ही, उन्होंने मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था में भी मदद की।
उन्होंने कहा, "हमने यह नहीं सोचा कि वे मुसलमान हैं। अगर हम राजनीति में होते, तो शायद ऐसा नहीं कर पाते।"
उन्होंने कहा कि आरएसएस ऐसे कामों का प्रचार नहीं करता। भागवत ने कहा, "गलत धारणाएं गलत कहानियों की वजह से बनती हैं। लेकिन जब आप हमारे बीच आकर हमें करीब से देखेंगे, तो ये सभी धारणाएं एक दिन के भीतर दूर हो जाएंगी।"
(Newe Source BBC Hindi)

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