(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)
संत कबीर नगर। मोटे अनाज यानी श्रीअन्न को केवल पारंपरिक खेती तक सीमित रखने के बजाय पोषण, स्वास्थ्य और टिकाऊ कृषि से जोड़ने की पहल तेज हो रही है। इसी क्रम में विकासखंड खलीलाबाद स्थित ब्लॉक संसाधन केंद्र पर प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए श्रीअन्न विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशिक्षण में शिक्षकों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि वे बच्चों और अभिभावकों तक श्रीअन्न के पोषण एवं स्वास्थ्य लाभ की जानकारी किस तरह प्रभावी ढंग से पहुंचा सकते हैं।
उप कृषि निदेशक डा. राकेश कुमार सिंह के अनुसार कार्यक्रम का उद्देश्य शिक्षकों को श्रीअन्न की उपयोगिता, पोषण संबंधी लाभ, उन्नत खेती की तकनीक और दैनिक आहार में इसके इस्तेमाल के प्रति जागरूक करना था।
बाजरा-ज्वार से लेकर कोदो और रागी तक की उपयोगिता समझाई
कृषि विज्ञान केंद्र संत कबीर नगर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. देवेश कुमार ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से शिक्षकों को बाजरा, ज्वार, रागी, कोदो, कुटकी और सांवा जैसी फसलों की उपयोगिता समझाई। उन्होंने बताया कि मोटे अनाज फाइबर, खनिज तत्व और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, जो संतुलित आहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने श्रीअन्न को बदलती जलवायु और सीमित जल उपलब्धता के दौर में महत्वपूर्ण फसल बताते हुए कहा कि इसे केवल पारंपरिक खाद्यान्न के रूप में देखने के बजाय पोषण सुरक्षा, जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि के माध्यम के रूप में अपनाने की जरूरत है।
खेती की तकनीक भी, थाली तक पहुंचाने की रणनीति भी
प्रशिक्षण में केवल श्रीअन्न के पोषण संबंधी फायदे गिनाने तक सीमित नहीं रहा गया, बल्कि इसकी खेती से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं पर भी जानकारी दी गई। शिक्षकों को उपयुक्त फसल एवं किस्म के चयन, बुवाई का उचित समय, बीज दर, खाद एवं उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण तथा कटाई के बाद प्रबंधन जैसी तकनीकों से अवगत कराया गया।
इसके साथ ही श्रीअन्न से तैयार होने वाले विभिन्न पौष्टिक खाद्य पदार्थों की जानकारी दी गई, ताकि शिक्षक बच्चों और अभिभावकों को इसे रोजमर्रा के भोजन में शामिल करने के लिए प्रेरित कर सकें।
सबसे बड़ी चुनौती जागरूकता को व्यवहार में बदलना
कार्यक्रम का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि श्रीअन्न की चर्चा को खेत से निकालकर विद्यालय और परिवार तक पहुंचाने की कोशिश की गई है। विद्यालय बच्चों में खान-पान की आदतें विकसित करने का प्रभावी माध्यम हैं। यदि शिक्षक श्रीअन्न को केवल पाठ्यक्रम या जागरूकता कार्यक्रम का विषय न बनाकर बच्चों की दैनिक जीवनशैली से जोड़ सकें, तो इसका प्रभाव परिवारों तक भी पहुंच सकता है।
हालांकि, यहां चुनौती केवल जानकारी देने की नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन की है। बच्चों को श्रीअन्न के फायदे बताने के साथ यह भी जरूरी होगा कि उन्हें स्वादिष्ट और स्वीकार्य रूप में उपलब्ध कराया जाए। अभिभावकों को भी इसके उपयोग, प्रसंस्करण और आसानी से तैयार होने वाले व्यंजनों की जानकारी मिले, तभी जागरूकता स्थायी आदत में बदल सकती है।
शिक्षकों के सवालों का दिया तकनीकी समाधान
प्रशिक्षण के दौरान शिक्षकों ने श्रीअन्न की खेती, पोषण, उपयोग और प्रसंस्करण से संबंधित सवाल पूछे। कृषि वैज्ञानिक डॉ. देवेश कुमार ने तकनीकी एवं व्यावहारिक जानकारी के आधार पर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। उन्होंने शिक्षकों से बच्चों को श्रीअन्न के महत्व की जानकारी सरल, रोचक और व्यवहारिक तरीके से देने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में सहायक विकास अधिकारी (कृषि) राम चौन, भूमि संरक्षण अधिकारी शशांक शेखर शुक्ला, सहायक विकास अधिकारी विजय प्रकाश पाण्डेय सहित संबंधित अधिकारी-कर्मचारी और प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षक मौजूद रहे।
प्रशिक्षण से आगे अब असली परीक्षा विद्यालयों में
श्रीअन्न को लेकर आयोजित प्रशिक्षण निश्चित रूप से जागरूकता की दिशा में सकारात्मक कदम है, लेकिन इसकी सफलता का मूल्यांकन प्रशिक्षण में शामिल शिक्षकों की संख्या से नहीं, बल्कि इसके बाद विद्यालयों में होने वाली गतिविधियों और बच्चों के खान-पान में आने वाले बदलाव से होना चाहिए।
यदि शिक्षक बच्चों, अभिभावकों और स्थानीय किसानों को जोड़कर श्रीअन्न आधारित जागरूकता को नियमित गतिविधि का रूप देते हैं, तो यह पहल पोषण सुरक्षा के साथ-साथ कम पानी वाली और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में भी उपयोगी साबित हो सकती है। अब चुनौती प्रशिक्षण से आगे बढ़कर श्रीअन्न को व्यवहार और भोजन की थाली तक पहुंचाने की है।


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