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सीआरसी में संकेत भाषा प्रतियोगिता के साथ अंतरराष्ट्रीय मूक-बधिर सप्ताह का समापन, समावेशन की दिशा में प्रशिक्षण पर जोर


(By-Mohammad Sayeed Pathan Editor Mission Sandesh)

गोरखपुर। सीआरसी गोरखपुर में संकेत भाषा प्रतियोगिता के साथ अंतरराष्ट्रीय मूक-बधिर सप्ताह का समापन हुआ। कार्यक्रम में मानव संसाधन विकास के डीएसएलई विभाग के प्रशिक्षुओं ने प्रतिभाग करते हुए लिखित वाक्यों को संकेत भाषा के माध्यम से प्रस्तुत किया। प्रतियोगिता के जरिए प्रतिभागियों ने न केवल संकेत भाषा में अपनी दक्षता दिखाई, बल्कि यह संदेश भी दिया कि संवाद के वैकल्पिक माध्यमों को बढ़ावा देकर बधिर एवं श्रवण बाधित लोगों की सामाजिक भागीदारी को मजबूत किया जा सकता है।

प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने स्वयं लिखे वाक्यों को संकेत भाषा में प्रस्तुत किया। आयोजन का उद्देश्य संकेत भाषा के प्रति रुचि और व्यावहारिक समझ विकसित करना रहा। इस तरह की गतिविधियां प्रशिक्षण को केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित रखने के बजाय उसे व्यवहारिक कौशल से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

पुलिस विभाग को संकेत भाषा का प्रशिक्षण, समावेशन की अहम कड़ी

अंतरराष्ट्रीय मूक-बधिर सप्ताह के दौरान गोरखपुर और महाराजगंज जनपद में पुलिस विभाग के लिए भी संकेत भाषा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह पहल विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा सकती है, क्योंकि पुलिस और दिव्यांग व्यक्तियों के बीच संवाद किसी शिकायत, दुर्घटना, अपराध अथवा आपात स्थिति में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

श्रवण एवं वाक् बाधित व्यक्ति यदि अपनी समस्या पुलिसकर्मी तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंचा पाता, तो उसकी शिकायत दर्ज कराने से लेकर आवश्यक सहायता प्राप्त करने तक कई व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आ सकती हैं। ऐसे में पुलिसकर्मियों को संकेत भाषा का बुनियादी प्रशिक्षण देना संवेदनशील और सुगम पुलिस व्यवस्था की दिशा में उपयोगी कदम हो सकता है।

संकेत भाषा केवल संवाद नहीं, सामाजिक भागीदारी का माध्यम

सीआरसी गोरखपुर के निदेशक जितेंद्र यादव ने कार्यक्रम की सफलता पर शुभकामनाएं देते हुए कहा कि संकेत भाषा बधिर लोगों को संबल प्रदान करने के साथ-साथ सामाजिक समावेशन में भी मददगार है।

वास्तव में संकेत भाषा को केवल संवाद का वैकल्पिक माध्यम मानने के बजाय अधिकार, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच के संदर्भ में देखना जरूरी है। यदि सरकारी संस्थानों, विद्यालयों, अस्पतालों, पुलिस थानों और अन्य सार्वजनिक सेवाओं में संकेत भाषा की बुनियादी समझ विकसित होती है, तो श्रवण बाधित लोगों के लिए सेवाओं तक पहुंच की बाधाएं कम हो सकती हैं।

कार्यक्रम को डॉ. विजय गुप्ता ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन कार्यक्रम समन्वयक आशीष गिरी ने किया, जबकि अंत में मुकेश यादव ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

अब चुनौती अभियान को नियमित प्रशिक्षण में बदलने की

सप्ताहभर चलने वाले जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके प्रभाव को स्थायी बनाने के लिए नियमित प्रशिक्षण और संस्थागत व्यवस्था की जरूरत होगी। विशेषकर पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक विभागों में ऐसे कर्मचारियों की संख्या बढ़ाना उपयोगी होगा जो कम से कम बुनियादी संकेत भाषा में संवाद कर सकें।

समीक्षात्मक रूप से देखें तो सीआरसी गोरखपुर का यह आयोजन केवल एक सप्ताह के कार्यक्रम तक सीमित न रहकर नियमित सामाजिक समावेशन की दिशा में आगे बढ़े, तो इसका वास्तविक लाभ बधिर एवं श्रवण बाधित समुदाय तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकता है। संकेत भाषा सीखने को विशेष प्रशिक्षण के बजाय सार्वजनिक सेवाओं की आवश्यक दक्षता के रूप में देखने की जरूरत भी इस आयोजन से सामने आती है।

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