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चुनाव आयोग पर बढ़ी निगाहें: SIR को लेकर सवाल, दो निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियां चर्चा में


नई दिल्ली। देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में है। हालिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि निर्वाचन आयोग के दो सदस्यों ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ निर्णयों और प्रक्रियाओं पर कई बार अपनी अलग राय दर्ज कराई। 

रिपोर्ट के मुताबिक, ये मतभेद मुख्य रूप से मतदाता सूची के पुनरीक्षण और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर सामने आए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि आयोग के अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं और आंतरिक विचार-विमर्श में अलग-अलग टिप्पणियां या मत होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। 

SIR बना सबसे बड़ा मुद्दा

SIR के तहत मतदाता सूचियों की जांच, नामों का सत्यापन और पात्र मतदाताओं को सूची में बनाए रखने की प्रक्रिया चल रही है। दिल्ली में भी बड़ी संख्या में मतदाताओं को उनके विवरण में कथित विसंगतियों को लेकर नोटिस जारी किए गए हैं। चुनाव आयोग के अनुसार, इनका उद्देश्य पात्रता और रिकॉर्ड की जांच करना है।

यही प्रक्रिया अब कई महत्वपूर्ण सवाल भी खड़े कर रही है—यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटता है तो उसे दोबारा शामिल कराने की प्रक्रिया कितनी सरल और समयबद्ध होगी? सत्यापन में सामने आई विसंगतियों की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी? और अंतिम मतदाता सूची तैयार होने से पहले नागरिकों को अपनी आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर कैसे सुनिश्चित किया जाएगा?

पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं के मामले में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि लाखों लोगों ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की है। आयोग ने यह भी कहा कि हटाए गए नामों में मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित अथवा डुप्लीकेट प्रविष्टियों से जुड़े मामले शामिल थे। 

आयोग की विश्वसनीयता पर बहस क्यों महत्वपूर्ण?

भारत में चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी प्राप्त है। ऐसे में मतदाता सूची में बदलाव से जुड़ी प्रत्येक प्रक्रिया का पारदर्शी, सत्यापन योग्य और नागरिकों के लिए सुलभ होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

वर्तमान विवाद में एक तरफ आयोग अपनी प्रक्रियाओं को नियमों के अनुरूप और अंतिम निर्णयों को सर्वसम्मत बता रहा है, वहीं दूसरी ओर आयोग के भीतर दर्ज कथित अलग-अलग टिप्पणियों ने कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक चर्चा बढ़ा दी है। 

सबसे बड़ा सवाल मतदाता के अधिकार का

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग वास्तविक मुद्दा यह है कि कोई भी पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित न हो और अपात्र नाम भी मतदाता सूची में न बने रहें।

SIR जैसी प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है, लेकिन इसकी सफलता का आकलन इस बात से भी होगा कि पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रहते हैं, गलत प्रविष्टियों को हटाने के साथ प्रभावित नागरिकों को प्रभावी अपील का अवसर मिलता है और पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है।

यही वे सवाल हैं जिनके जवाब आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR प्रक्रिया को लेकर जनता के भरोसे के लिए महत्वपूर्ण होंगे।

(Source The Indian Express)

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