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पीएम मोदी नहीं जाएंगे ईरान, खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे सैयद अता हसनैन और पबित्रा मार्गेरिटा


नई दिल्ली। 
भारत सरकार ने ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार में उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का निर्णय लिया है। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इस समारोह में शामिल नहीं होंगे। उनकी ओर से केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा और बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। यह निर्णय भारत की संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने प्रधानमंत्री मोदी को अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए औपचारिक निमंत्रण भेजा था। हालांकि, भारत सरकार ने प्रधानमंत्री की बजाय वरिष्ठ प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह प्रतिनिधिमंडल भारत सरकार और भारतीय जनता की ओर से संवेदना व्यक्त करेगा तथा दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे मैत्रीपूर्ण संबंधों को आगे बढ़ाने का संदेश देगा। 

भारत ने साधा कूटनीतिक संतुलन

विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि भारत का यह निर्णय पश्चिम एशिया में उसकी संतुलित कूटनीति का उदाहरण है। भारत के ईरान, इज़राइल, खाड़ी देशों और अमेरिका—सभी के साथ महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। ऐसे में भारत ने शोक व्यक्त करने और सम्मान देने की परंपरा निभाते हुए उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया, जबकि प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति से क्षेत्रीय और वैश्विक कूटनीतिक संतुलन भी बनाए रखा गया है।

ऊर्जा और रणनीतिक दृष्टि से अहम है ईरान

ईरान भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण साझेदार रहा है। चाबहार बंदरगाह परियोजना, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) और मध्य एशिया तक पहुंच के लिए ईरान की भूमिका भारत की विदेश नीति में विशेष महत्व रखती है। ऐसे में अंतिम संस्कार में भारत की आधिकारिक भागीदारी दोनों देशों के पारंपरिक संबंधों को मजबूत बनाए रखने का संकेत मानी जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की रहेगी नजर

आयतुल्ला खामेनेई के निधन के बाद ईरान की आंतरिक राजनीति और क्षेत्रीय समीकरणों पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। अंतिम संस्कार में कई देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। भारत की भागीदारी इस बात का संकेत है कि वह पश्चिम एशिया में संवाद, स्थिरता और संतुलित संबंधों की अपनी नीति पर कायम है। 

भारत का यह कदम केवल शोक संवेदना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में नई दिल्ली अपने दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों और बहुपक्षीय कूटनीतिक संबंधों को समान महत्व दे रही है।

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