(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)
संतकबीरनगर। जिलाधिकारी आलोक कुमार की अध्यक्षता में मंगलवार को कलेक्ट्रेट सभागार में पत्रकार स्थायी समिति की बैठक आयोजित हुई। बैठक में सूचना संकुल (प्रेस क्लब) भवन निर्माण, पत्रकारों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं, आयुष्मान भारत योजना का लाभ, आरटीई के तहत बच्चों की शिक्षा तथा पत्रकारों की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई। जिलाधिकारी ने इन मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई का भरोसा भी दिलाया।
बैठक में उठाए गए विषय निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन एक ऐसा मुद्दा, जो वर्षों से पत्रकार समाज की सबसे बड़ी पीड़ा बना हुआ है, उस पर गंभीर और ठोस चर्चा दिखाई नहीं दी। जनपद के कई पत्रकारों का कहना है कि जनहित से जुड़े समाचार प्रकाशित करने के बाद उनके विरुद्ध विभिन्न गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए, जिनमें से अनेक मामले आज भी वर्षों से न्यायालयों में लंबित हैं। इन मुकदमों का प्रभाव केवल पत्रकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके परिवार भी मानसिक, सामाजिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं।
पत्रकारों के बीच यह सवाल भी उठता है कि यदि पत्रकार स्थायी समिति का उद्देश्य पत्रकारों की समस्याओं का समाधान करना है, तो ऐसे संवेदनशील और लंबे समय से लंबित मामलों को बैठक के एजेंडे में प्रमुखता से क्यों नहीं रखा जाता। यदि सबसे गंभीर समस्याएं ही चर्चा से बाहर रह जाएं, तो बैठकें केवल औपचारिकता बनकर रह जाने का आभास देती हैं।
यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि यदि किसी मुकदमे की विवेचना के दौरान नए तथ्य सामने आते हैं, पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं होते या प्रारंभिक आरोपों से अलग स्थिति बनती है, तो पुलिस का दायित्व है कि वह निष्पक्ष समीक्षा कर न्यायालय के समक्ष तथ्यों पर आधारित चार्जशीट अथवा आवश्यक विधिक रिपोर्ट प्रस्तुत करे। इससे न्यायिक प्रक्रिया को गति मिलेगी और लंबे समय से लंबित मामलों के निष्पक्ष निस्तारण का मार्ग प्रशस्त होगा।
बैठक के दौरान जिलाधिकारी आलोक कुमार ने कहा कि प्रशासन प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। उन्होंने आश्वस्त किया कि किसी भी पत्रकार के साथ उत्पीड़न की शिकायत मिलने पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी तथा किसी भी शिकायत पर निष्पक्ष एवं तथ्यात्मक जांच के बाद ही विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
अब आवश्यकता इस बात की है कि इन आश्वासनों को व्यवहार में भी उतारा जाए। यदि वास्तव में पत्रकारों की सुरक्षा और सम्मान प्रशासन की प्राथमिकता है, तो वर्षों से लंबित और विवादित मामलों की निष्पक्ष समीक्षा कर न्यायालय में तथ्यपरक रिपोर्ट प्रस्तुत करने की दिशा में भी प्रभावी पहल होनी चाहिए। इससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया मजबूत होगी, बल्कि पत्रकार समाज का प्रशासन और कानून व्यवस्था पर विश्वास भी और अधिक सुदृढ़ होगा।
डिस्क्लेमर:
यह लेख एक समीक्षात्मक/संपादकीय विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार उपलब्ध तथ्यों, सार्वजनिक सूचनाओं एवं पत्रकार हितों से जुड़े मुद्दों के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या विभाग की छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि जनहित एवं पत्रकारों से जुड़े विषयों पर रचनात्मक विमर्श को बढ़ावा देना है। किसी भी प्रकरण में आरोपों की पुष्टि या अंतिम निर्णय का अधिकार सक्षम जांच एजेंसी एवं न्यायालय के पास है। यदि किसी पक्ष को इस लेख में प्रकाशित किसी तथ्य पर आपत्ति हो, तो उसका स्पष्टीकरण या पक्ष प्रकाशित करने के लिए मिशन संदेश सदैव तैयार है।

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