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संतकबीरनगर: साइबर ठगी पर महुली पुलिस की बड़ी तैयारी, रकम फ्रीज कराने और डिजिटल साक्ष्य जुटाने की मिली ट्रेनिंग


(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)

संतकबीरनगर। साइबर अपराध के बढ़ते और लगातार बदलते स्वरूप के बीच पुलिस के सामने केवल अपराध दर्ज करने की नहीं, बल्कि ठगी के बाद चंद मिनटों में धनराशि को ट्रेस कर फ्रीज कराने, डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने और पीड़ित को राहत दिलाने की बड़ी चुनौती है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए पुलिस अधीक्षक संतकबीरनगर संदीप कुमार मीना के निर्देशन और अपर पुलिस अधीक्षक सुशील कुमार सिंह के मार्गदर्शन में थाना महुली में विशेष साइबर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में साइबर थाना प्रभारी जयप्रकाश चौबे के नेतृत्व में साइबर टीम ने थाना महुली की साइबर टीम और संबंधित पुलिसकर्मियों को साइबर अपराध की शिकायतों पर त्वरित, तकनीकी और परिणामपरक कार्रवाई की प्रक्रिया समझाई।


शिकायत के बाद शुरुआती समय को बताया निर्णायक

प्रशिक्षण में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि साइबर फ्रॉड के मामलों में शिकायत मिलने के बाद शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। खाते से निकली रकम को समय रहते ट्रेस और फ्रीज कराने की कार्रवाई जितनी तेजी से होगी, पीड़ित की धनराशि वापस मिलने की संभावना उतनी ही बेहतर हो सकती है।

पुलिसकर्मियों को साइबर ठगी के मामलों में आवश्यक प्रारंभिक कार्रवाई, धनराशि की ट्रैकिंग और पीड़ित को राहत दिलाने की प्रक्रिया के संबंध में व्यावहारिक जानकारी दी गई।

तकनीकी माध्यमों और NCRP के इस्तेमाल पर प्रशिक्षण

प्रशिक्षण के दौरान लिंकिंग, MRM और GRM से संबंधित कार्यप्रणाली तथा उपलब्ध तकनीकी माध्यमों के उचित इस्तेमाल की जानकारी दी गई। साइबर अपराध से जुड़ी धनराशि को ट्रैक करने और मामले की कड़ियों को जोड़ने की प्रक्रिया को भी समझाया गया।

इसके अलावा NCRP (National Cyber Crime Reporting Portal) पर शिकायत दर्ज करने, शिकायतों की निगरानी, आवश्यक कार्रवाई और पोर्टल पर समयबद्ध तरीके से अपडेट करने की प्रक्रिया पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

डिजिटल साक्ष्य जांच की रीढ़

साइबर अपराध की विवेचना में डिजिटल साक्ष्य की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए पुलिसकर्मियों को प्राप्त डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने, उनका तकनीकी विश्लेषण करने और विवेचना के दौरान उनका प्रभावी इस्तेमाल करने के संबंध में दिशा-निर्देश दिए गए।

यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि साइबर अपराध में अपराधी और पीड़ित अक्सर अलग-अलग स्थानों पर होते हैं और अपराध के पीछे डिजिटल लेन-देन, मोबाइल नंबर, बैंकिंग चैनल, सोशल मीडिया अथवा अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की भूमिका हो सकती है। ऐसे में पारंपरिक पुलिसिंग के साथ तकनीकी दक्षता भी जरूरी हो जाती है।



पीड़ित के साथ संवेदनशील व्यवहार पर भी जोर

प्रशिक्षण में केवल तकनीकी कार्रवाई ही नहीं, बल्कि साइबर अपराध पीड़ितों के साथ संवेदनशील व्यवहार और लगातार फॉलोअप को भी पुलिसिंग का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया। अधिकारियों ने संदेश दिया कि साइबर ठगी में पीड़ित की रकम उसके लिए महज आर्थिक आंकड़ा नहीं होती, बल्कि उसमें परिवार की जरूरतें, बच्चों का भविष्य और वर्षों की मेहनत जुड़ी हो सकती है।

विश्लेषण: साइबर अपराध में ‘स्पीड’ ही पुलिसिंग की असली परीक्षा

महुली थाने में हुआ यह प्रशिक्षण ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब साइबर ठगी के तरीके लगातार बदल रहे हैं। फर्जी लिंक, डिजिटल भुगतान, बैंकिंग फ्रॉड और अन्य ऑनलाइन माध्यमों के जरिए होने वाले अपराधों में अपराधी कुछ ही समय में रकम को कई खातों के माध्यम से आगे बढ़ा सकते हैं। ऐसे में शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया और वास्तविक तकनीकी कार्रवाई के बीच का समय पुलिस की प्रभावशीलता तय करने वाला महत्वपूर्ण कारक बन जाता है।

हालांकि प्रशिक्षण कार्यक्रम से पुलिसकर्मियों की तकनीकी क्षमता बढ़ाने का प्रयास स्पष्ट है, इसकी वास्तविक सफलता का आकलन कितनी शिकायतों में समय पर कार्रवाई हुई, कितनी धनराशि फ्रीज अथवा रिकवर कराई गई और कितने मामलों में डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों तक पहुंच बनाई गई, जैसे परिणामों से होगा।

कुल मिलाकर, महुली पुलिस को दिया गया यह प्रशिक्षण साइबर अपराध के खिलाफ स्थानीय स्तर पर पुलिस की तकनीकी क्षमता मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। साइबर अपराध में समय ही सबसे महत्वपूर्ण हथियार है—और इसी गति, तकनीकी दक्षता तथा संवेदनशीलता को प्रभावी पुलिसिंग में बदलना अब पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

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