संतकबीरनगर। नाबालिग को बहला-फुसलाकर भगाने, शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने और अश्लील फोटो सोशल मीडिया पर प्रसारित करने के आरोप से जुड़े करीब सात वर्ष पुराने मामले में अदालत ने अभियोजन के पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत न कर पाने पर आरोपित को दोषमुक्त कर दिया। अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश पाक्सो एक्ट कृष्ण कुमार पंचम ने महुली थाना क्षेत्र के मोनिस पुत्र अब्दुल सत्तार को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया।
पुलिस अधीक्षक को दिए प्रार्थना पत्र से शुरू हुआ था मामला
आरोपित के अधिवक्ता मोहम्मद असलम के अनुसार, वादिनी ने 12 मार्च 2019 को पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना पत्र देकर आरोप लगाया था कि गांव का ही मोनिस उसकी नाबालिग पुत्री को घर के सामने स्थित छप्पर में ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। लोकलाज के चलते पीड़िता द्वारा तत्काल घटना की जानकारी परिवार को नहीं देने की बात भी शिकायत में कही गई थी।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि इसके बाद आरोपित शादी का झांसा देकर पीड़िता के साथ चोरी-छिपे दुष्कर्म करता रहा तथा उसकी अश्लील फोटो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित कर दी। पुलिस अधीक्षक के आदेश पर महुली थाने में मुकदमा दर्ज किया गया।
आईपीसी, पॉक्सो और आईटी एक्ट में दाखिल हुआ था आरोपपत्र
विवेचना पूरी करने के बाद पुलिस ने आरोपित के खिलाफ धारा 363, 366 और 376 आईपीसी के साथ पॉक्सो एक्ट तथा आईटी एक्ट की संबंधित धाराओं में आरोपपत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया। आरोपित ने अदालत में आरोपों से इनकार करते हुए विचारण का सामना किया।
सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से छह गवाह और आठ अभिलेखीय साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। हालांकि, न्यायालय के समक्ष अभियोजन पक्ष आरोपों को ऐसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका, जिससे आरोप संदेह से परे सिद्ध हो सकें।
वादिनी की जिरह से पहले मृत्यु, पीड़िता भी पूर्व कथन से मुकर गई
मामले की सुनवाई में एक महत्वपूर्ण स्थिति यह रही कि वादिनी की जिरह होने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। वहीं, पीड़िता अपने पूर्व कथन से मुकर गई। इससे अभियोजन के मामले को अपेक्षित मजबूती नहीं मिल सकी। उपलब्ध साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के बाद अदालत ने माना कि आरोपित के विरुद्ध आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हुए हैं।
साक्ष्य के अभाव में मिला संदेह का लाभ
आपराधिक न्याय व्यवस्था में अभियोजन पर आरोपों को संदेह से परे साबित करने का दायित्व होता है। इस मामले में अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद अभियोजन के आरोपों को पर्याप्त रूप से सिद्ध न पाए जाने पर आरोपित मोनिस को संदेह का लाभ दिया और उसे सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि गंभीर आरोप होने मात्र से दोष सिद्ध नहीं होता; न्यायालय में आरोपों की पुष्टि विश्वसनीय, ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों से होना आवश्यक है।

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