(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)
संतकबीरनगर। घरेलू और पारिवारिक विवादों के बढ़ते मामलों के बीच हर विवाद का समाधान सीधे कानूनी कार्रवाई तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं। कई मामलों में संवाद, काउंसलिंग और आपसी समझौता भी परिवारों को टूटने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसी उद्देश्य से मिशन शक्ति फेज-5.0 के तहत चलाए जा रहे ‘साथ-साथ कार्यक्रम’ के अंतर्गत महिला थाना स्थित परिवार परामर्श केंद्र में रविवार को पांच पारिवारिक मामलों की सुनवाई कर आपसी सहमति से सुलह-समझौता कराया गया।
पुलिस अधीक्षक संतकबीरनगर संदीप कुमार मीना के निर्देशन में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता महिला थाना प्रभारी पूनम मौर्या ने की। इस दौरान महिला कांस्टेबल विनीता सिंह, रिंकी गौतम तथा काउंसलर रिफातुल्लाह अंसारी मौजूद रहे।
विवादों के बीच संवाद को बनाया समाधान का माध्यम
परिवार परामर्श केंद्र में आए मामलों में पति-पत्नी अथवा वैवाहिक संबंधों से जुड़े विवाद शामिल रहे। काउंसलिंग के दौरान दोनों पक्षों की बात सुनी गई और आपसी मतभेदों को दूर करने के लिए समझाइश दी गई। पुलिस के अनुसार, समझाने-बुझाने के बाद सभी पांच मामलों में संबंधित पक्ष आपसी सहमति से साथ रहने के लिए तैयार हुए।
इनमें कसैला, ब्यारा, बनौहिया और रानीपार समेत अन्य क्षेत्रों से जुड़े पारिवारिक विवाद शामिल रहे। संबंधित पक्षों की सहमति के आधार पर सुलह-समझौता कराया गया।
परिवार परामर्श केंद्र की ऐसी पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि पारिवारिक विवादों को केवल शिकायत और मुकदमे के नजरिए से नहीं, बल्कि संवाद और समाधान के दृष्टिकोण से भी देखा जाता है। घरेलू विवादों में कई बार गलतफहमी, संवादहीनता, आर्थिक तनाव या आपसी मतभेद रिश्तों में दूरी पैदा करते हैं। ऐसे मामलों में निष्पक्ष काउंसलिंग दोनों पक्षों को अपनी बात रखने और समाधान तलाशने का अवसर देती है।
हालांकि, सुलह-समझौते की प्रक्रिया की सफलता तभी सार्थक मानी जा सकती है जब समझौते के बाद परिवार में सम्मान, सुरक्षा और स्वस्थ वातावरण कायम रहे। केवल सामाजिक दबाव में समझौता कराना किसी विवाद का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
विश्लेषण: परिवार बचाना अच्छी पहल, लेकिन सुरक्षा सर्वोच्च
महिला थाना द्वारा पांच परिवारों में सुलह कराना मिशन शक्ति के उस पहलू को सामने लाता है जिसमें महिलाओं और परिवारों की समस्याओं के समाधान के लिए पुलिसिंग को केवल कार्रवाई तक सीमित न रखकर परामर्श और सामाजिक हस्तक्षेप से जोड़ा जा रहा है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण संतुलन भी जरूरी है। जहां विवाद सामान्य मतभेद या संवादहीनता से जुड़े हों, वहां काउंसलिंग प्रभावी माध्यम हो सकती है। वहीं हिंसा, गंभीर उत्पीड़न, दहेज प्रताड़ना या किसी अन्य गंभीर अपराध के मामलों में केवल समझौते को प्राथमिकता देना उचित नहीं होगा। ऐसे मामलों में पीड़ित की सुरक्षा, उसकी स्वतंत्र सहमति और कानून के अनुसार कार्रवाई सर्वोपरि रहनी चाहिए।
फिलहाल महिला थाना परिवार परामर्श केंद्र की पहल ने पांच परिवारों को दोबारा साथ रहने का अवसर दिया है। अब इस पहल की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि समझौते के बाद इन परिवारों में विवाद दोबारा न लौटे और संबंधित महिलाओं को सुरक्षित एवं सम्मानजनक पारिवारिक माहौल मिले।


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