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संतकबीरनगर: पराली जलाने से मिट्टी को नुकसान, 25 किसानों को सिखाईं गईं प्रबंधन तकनीकें


कृषि विज्ञान केंद्र में पांच दिवसीय प्रशिक्षण संपन्न, फसल अवशेषों के वैज्ञानिक उपयोग और मृदा स्वास्थ्य संरक्षण पर जोर

Report by- Mohammad Sayeed Pathan Editor Mission Sandesh 

संतकबीरनगर, । कृषि विज्ञान केंद्र, संतकबीरनगर में फसल अवशेष प्रबंधन पर आयोजित पांच दिवसीय व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम का 12 अक्टूबर को समापन हुआ। 8 से 12 अक्टूबर तक चले प्रशिक्षण में 25 किसानों को पराली जलाने के नुकसान, जैविक खाद निर्माण और फसल अवशेषों के वैज्ञानिक उपयोग की जानकारी दी गई।

कृषि अभियांत्रिकी वैज्ञानिक डॉ. देवेश कुमार ने बताया कि एक टन फसल अवशेष जलाने से लगभग 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फॉस्फोरस, 2.5 किलोग्राम पोटाश और 1.2 किलोग्राम सल्फर की हानि हो सकती है। पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीवों को भी नुकसान पहुंचता है।

केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. सीपीएन गौतम ने किसानों से पराली जलाने के बजाय उसका वैज्ञानिक प्रबंधन अपनाने की अपील की। वैज्ञानिक डॉ. दुर्गेश कुमार ने फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाने और पूसा डीकंपोजर जैसी तकनीकों के उपयोग की जानकारी दी। वहीं, डॉ. तरुण कुमार, डॉ. अभिनव सिंह और डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने कृषि वानिकी, वैज्ञानिक तकनीकों के प्रसार और गुणवत्तापूर्ण बीजों के महत्व पर प्रकाश डाला।

प्रशिक्षण के समापन पर किसानों को प्रमाण-पत्र और प्रक्षेत्र उत्पाद वितरित किए गए। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के साथ रामकरण यादव, पंकज यादव, पुष्पलता, विजय पांडे, रामरतन भास्कर और विशाल कुमार सहित अन्य किसान मौजूद रहे।

समीक्षात्मक पहलू: प्रशिक्षण से किसानों में जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया है। हालांकि, पराली जलाने की समस्या में प्रभावी कमी के लिए किसानों को जागरूक करने के साथ जरूरी मशीनरी, तकनीकी सहायता और व्यावहारिक विकल्पों की उपलब्धता भी सुनिश्चित करना जरूरी है।

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