(Report and edited by-Mohammad Sayeed Pathan)
गोरखपुर। दृष्टिबाधित एवं अल्प दृष्टिवान व्यक्तियों के पुनर्वास और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान, देहरादून एवं कंपोजिट रीजनल सेंटर (सीआरसी), गोरखपुर के संयुक्त तत्वावधान में "अल्प दृष्टि : वैचारिक अवधारणा" विषय पर दो दिवसीय ऑफलाइन कंटीन्यूइंग रिहैबिलिटेशन एजुकेशन (सीआरई) कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य पुनर्वास पेशेवरों के ज्ञान और कौशल को अद्यतन करने के साथ-साथ अल्प दृष्टि से जुड़ी चुनौतियों के वैज्ञानिक समाधान पर मंथन करना है।
कार्यक्रम में बतौर रिसोर्स पर्सन डॉ. प्रियदर्शी मिश्रा (पुनर्वास अधिकारी, सीआरसी सुंदरनगर), डॉ. राम यश यादव (विभागाध्यक्ष, नेत्र रोग विभाग, बीआरडी मेडिकल कॉलेज), प्रदीप कुमार मिश्रा (प्रवक्ता, दृष्टिबाधित बालक इंटर कॉलेज, गोरखपुर) तथा राजेश कुमार (सहायक प्राध्यापक, नैदानिक मनोविज्ञान विभाग, सीआरसी गोरखपुर) ने अल्प दृष्टि के कारणों, समय पर पहचान, बचाव, पुनर्वास तकनीकों तथा व्यवहारिक प्रशिक्षण के विभिन्न आयामों पर विस्तार से जानकारी दी।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए सीआरसी गोरखपुर के निदेशक जितेंद्र यादव ने कहा कि अल्प दृष्टिवान व्यक्तियों की क्षमताओं को पहचानकर यदि उन्हें आधुनिक तकनीक, विशेष प्रशिक्षण और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जाए तो वे न केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी प्रभावी योगदान दे सकते हैं।
सिर्फ प्रशिक्षण नहीं, जमीनी बदलाव की भी जरूरत
यह कार्यक्रम पुनर्वास क्षेत्र के पेशेवरों के लिए निस्संदेह उपयोगी है, क्योंकि सीआरई के माध्यम से उनके प्रमाण-पत्रों का नवीनीकरण भी होता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रमों का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब प्रशिक्षण का लाभ ग्रामीण क्षेत्रों, सरकारी विद्यालयों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्तर तक पहुंचे।
देश में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे और वयस्क हैं, जो अल्प दृष्टि से प्रभावित होने के बावजूद समय पर जांच, उचित परामर्श और सहायक उपकरणों के अभाव में शिक्षा, रोजगार और सामाजिक अवसरों से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में केवल सेमिनार और कार्यशालाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि व्यापक जनजागरूकता, नियमित स्क्रीनिंग, प्रशिक्षित मानव संसाधन और सुलभ पुनर्वास सेवाओं का विस्तार भी उतना ही आवश्यक है।
प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए लगभग 50 प्रतिभागियों की मौजूदगी इस विषय के प्रति बढ़ती गंभीरता का संकेत है। यदि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में प्राप्त ज्ञान को व्यवहारिक स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो यह अल्प दृष्टिवान व्यक्तियों के जीवन में सकारात्मक और स्थायी बदलाव लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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