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संतकबीरनगर में पराली जलाने पर लगेगा ₹15 हजार तक जुर्माना, बिना स्ट्रॉ रीपर के कंबाइन से कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध


डीएम अनुज मलिक की किसानों से अपील—खेतों में फसल अवशेष न जलाएं; नियम तोड़ने वाले किसानों और कंबाइन मालिकों पर हो सकती है कार्रवाई

Report by- Mohammad Sayeed Pathan Editor Mission Sandesh 

संतकबीरनगर ।  की कटाई के मौसम में पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण, मिट्टी की उर्वरता में कमी और आगजनी की घटनाओं को रोकने के लिए जिला प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। जिलाधिकारी अनुज मलिक ने जनपद के किसानों से फसल अवशेष खेतों में नहीं जलाने की अपील करते हुए स्पष्ट किया है कि बिना स्ट्रॉ रीपर या निर्धारित वैकल्पिक व्यवस्था के कंबाइन हार्वेस्टिंग मशीन से फसल कटाई की अनुमति नहीं होगी। नियमों का उल्लंघन करने वाले कंबाइन मालिकों के विरुद्ध विधिक कार्रवाई और सिविल दायित्व निर्धारित किए जाने की चेतावनी दी गई है।

प्रशासन की इस पहल का उद्देश्य पराली जलाने से होने वाले नुकसान को रोकना और किसानों को फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन के प्रति जागरूक करना है। हालांकि, नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए किसानों को जागरूक करने के साथ-साथ पराली के निस्तारण के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण होगा।

पराली जलाने पर खेत के रकबे के अनुसार अर्थदंड

जिलाधिकारी के अनुसार, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी), नई दिल्ली के निर्धारित प्रावधानों के तहत फसल अवशेष जलाने पर खेत के क्षेत्रफल के अनुसार क्षतिपूर्ति वसूलने का प्रावधान है। प्रशासन की ओर से बताई गई दरें इस प्रकार हैं:

- **दो एकड़ से कम क्षेत्रफल:** ₹2,500 प्रति घटना

-दो से पांच एकड़ तक क्षेत्रफल:** ₹5,000 प्रति घटना

-पांच एकड़ से अधिक क्षेत्रफल:** ₹15,000 प्रति घटना

फसल अवशेष जलाने के मामले में संबंधित प्रावधानों के अनुसार अन्य दंडात्मक कार्रवाई भी हो सकती है। ऐसे में किसानों के लिए जरूरी है कि वे कटाई के बाद खेत में आग लगाने के बजाय फसल अवशेषों के प्रबंधन के सुरक्षित तरीके अपनाएं।

मिट्टी की उर्वरता से लेकर स्वास्थ्य तक पर पड़ता है असर

जिलाधिकारी ने किसानों को आगाह किया कि पराली जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट होते हैं, भूमि की उर्वरता प्रभावित होती है और आगामी फसल की पैदावार पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसके अलावा, खेतों में आग लगाने से पशुओं के चारे की उपलब्धता प्रभावित होती है और वातावरण में प्रदूषण बढ़ता है।

पराली जलाने से उठने वाला धुआं आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है। आग फैलने की स्थिति में खेतों, आसपास की संपत्तियों और पशुओं को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसलिए पराली प्रबंधन केवल कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि कृषि भूमि की गुणवत्ता और जनस्वास्थ्य से जुड़ा विषय भी है।

इसके विपरीत, फसल अवशेषों को उचित तरीके से खेत में मिलाने या उनका अन्य उपयोग करने से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने, जल धारण क्षमता में सुधार करने और लाभकारी सूक्ष्म जीवों को संरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।

बिना स्ट्रॉ रीपर कंबाइन से कटाई पर प्रतिबंध

प्रशासन के मुताबिक, कंबाइन हार्वेस्टिंग मशीन से फसल काटते समय खेत में लगभग एक फुट तक डंठल और अवशेष रह जाते हैं। कई किसान अगली फसल की बुवाई के लिए खेत खाली करने के उद्देश्य से इन्हें जला देते हैं। इसी समस्या को रोकने के लिए कृषि अनुभाग-2, उत्तर प्रदेश शासन के निर्देशों के तहत कंबाइन मशीन के साथ स्ट्रॉ रीपर विद बाइंडर अथवा स्ट्रॉ रीपर का प्रयोग अनिवार्य किया गया है।

जिलाधिकारी ने सभी कंबाइन मशीन मालिकों को चेतावनी दी है कि बिना स्ट्रॉ रीपर के फसल कटाई पूरी तरह प्रतिबंधित है। निर्देशों का उल्लंघन करने पर संबंधित मशीन मालिक के विरुद्ध सिविल दायित्व निर्धारित करने के साथ विधिक कार्रवाई की जा सकती है।

यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पराली जलाने की समस्या का समाधान केवल किसानों पर जुर्माना लगाने से नहीं होगा। कटाई के समय मशीनों में निर्धारित उपकरणों का इस्तेमाल, फसल अवशेषों का उचित निस्तारण और किसानों को समय पर जानकारी देना भी जरूरी है।

 कार्रवाई के साथ विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी

प्रशासन की सख्ती से पराली जलाने की घटनाओं पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों को फसल अवशेषों के निस्तारण के लिए कितनी आसानी से उपयुक्त साधन उपलब्ध होते हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए मशीनों का खर्च, समय पर उपलब्धता और अगली फसल की बुवाई की तैयारी जैसी चुनौतियां भी महत्वपूर्ण हैं।

ऐसे में कृषि विभाग और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी होगी कि किसानों को स्ट्रॉ रीपर सहित उपयोगी कृषि उपकरणों की उपलब्धता, फसल अवशेष प्रबंधन के तरीकों और संबंधित सरकारी सुविधाओं की जानकारी दी जाए। इससे नियमों का पालन आसान होगा और किसानों को आर्थिक नुकसान से बचाने में भी मदद मिलेगी।

जिलाधिकारी अनुज मलिक ने किसानों से अपील की है कि वे पर्यावरण, मिट्टी की उर्वरता और जनस्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए पराली न जलाएं तथा निर्धारित नियमों का पालन करें। अब प्रशासन के सामने चुनौती जागरूकता, निगरानी और व्यावहारिक विकल्पों के समन्वय से पराली जलाने की घटनाओं को रोकने की होगी।

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