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योगी सरकार कार्यकाल के दौरान, सचिवालय में भर्तियों की घपलेबाजी का हाईकोर्ट ने लिया संज्ञान, सीबीआई जांच के दिए आदेश

लखनऊ। यूपी विधानसभा और विधान परिषद सचिवालय में बड़े पैमाने पर योगी 1.0 सरकार में साल 2020-2021 के दरमियान भर्तियां हुई थीं। इन भर्तियों में हुई अनियमितताओं का मुद्दा उठाते हुए विपिन कुमार सिंह ने हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में याचिका दायर की थी। जस्टिस ए आर मसूदी और जस्टिस ओमप्रकाश शुक्ला की डबल बेंच ने सुशील कुमार व दो अन्य की विशेष अपील के साथ ही विपिन सिंह की याचिका की सुनवाई की।

भर्तियों की इस बड़ी घपलेबाजी का स्वत संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका यानी पीआईएल के रूप में दर्ज करने के साथ ही सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट ने शुरुआती जांच की रिपोर्ट 6 हफ्ते में पेश करने के लिए कहा। अदालत ने ये टिप्पणी भी की है कि सरकारी नौकरी में भर्ती के लिए प्रतियोगिता मूल नियम है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भर्ती एजेंसियों की विश्वसनीयता बहुत ही जरूरी है। साथ ही पेश किए गए मूल रिकार्ड को सील कवर में रखने के आदेश दिए गए।

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इस मामले में सहयोग के लिए सीनियर एडवोकेट डॉ. एलपी मिश्रा को एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) नियुक्त किया गया है। हाईकोर्ट ने विशेष अपील और जनहित याचिका को नवंबर के पहले हफ्ते में सूचीबद्ध करने का आदेश भी दिया है। दिलचस्प मुद्दा ये भी है कि मायावती-अखिलेश और फिर योगीराज तक विधानसभा के प्रमुख सचिव पद पर लगातार तैनात प्रदीप दुबे को लेकर भी कई सवाल उठ चुके हैं, उनकी नियुक्ति की जांच के राज्यपाल ने आदेश भी दिए थे।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी-विधानसभा-विधान परिषद सचिवालय की भर्ती प्रक्रिया विशिष्ट संवैधानिक भर्ती संस्था करे, न कि चयन समिति या निजी एजेंसी

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इसी साल सुशील कुमार एवं अन्य की ओर से दाखिल याचिका की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा था कि भविष्य में विधानसभा और विधान परिषद में तृतीय श्रेणी के पदों के लिए भर्तियां यूपीएसएसएससी (उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग) के जरिये ही कराई जाएं।

अदालत ने तीन माह में भर्ती नियमों में आवश्यक संशोधन के भी आदेश दिए थे। आपको बता दें कि इस याचिका में विधान परिषद सचिवालय में समीक्षा अधिकारी, सहायक समीक्षा अधिकारी एवं अपर निजी सचिव सहित 11 कैडर के 99 रिक्त पदों पर भर्ती के लिए 17 जुलाई 2020 और 27 सितम्बर 2020 के विज्ञापनों के संदर्भ में की गई भर्ती प्रक्रिया को निरस्त किए जाने की मांग की गई थी।

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याचियों की दलील थी कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों को धता बताते हुए, भाई-भतीजावाद और पक्षपात किया गया। दावा किया गया कि भर्ती परीक्षा के दिन गोरखपुर केंद्र से प्रश्नपत्र भी लीक हो गया था। यह भी आरोप लगाया कि पुराने नियम के उलट भर्ती प्रक्रिया की जिम्मेदारी चयन समिति को दी गई। जिसने सचिवालय के तमाम अधिकारियों के करीबियों का चयन हो गया।

अदालत ने सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद पारित अपने आदेश में भर्ती प्रक्रिया रद्द करने की मांग तो खारिज कर दी। लेकिन कहा कि जनता का विधानसभा और विधान परिषद की भर्ती प्रक्रियाओं में विश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि भर्ती प्रक्रिया विशिष्ट संवैधानिक भर्ती संस्था के हाथ में हो, न कि चयन समिति या निजी एजेंसी के पास। यह भी निर्देश दिया है कि जो याचीगण संविदा के आधार पर काम कर रहे हैं, वे यूपीएसएसएससी द्वारा नियमित चयन किए जाने तक अपने पदों पर काम करते रहेंगे।

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विधानसभा-विधानपरिषद सचिवालय में भर्तियों की गड़बड़ी को लेकर उठ चुके हैं सवाल

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उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय से सहायक समीक्षा अधिकारी के 53 और समीक्षा अधिकारी के 13 पदों सहित कुल 87 पदों के लिए 7 दिसंबर 2020 को भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई। हर परीक्षा के लिए अलग-अलग बार प्री-परीक्षा हुई। जिसके बाद मेन्स परीक्षा हुई। कुछ पदों में शार्ट हैंड और टाइपिंग का टेस्ट भी हुआ। इसमें असफल हुए कुछ अभ्यर्थियों ने सीएम से लेकर पीएम तक चिट्‌ठी लिखकर गंभीर आरोप लगाए। उसी साल विधान परिषद में भी 73 पदों की भर्ती के विज्ञापन निकाले गए, जिसमें एआरओ पद का जिक्र नहीं था।

विज्ञापन को संशोधित करते हुए 27 सितंबर को एआरओ के 23 पदों के लिए भी आवेदन मांगे गए। इस तरह फिर कुल 96 पदों के लिए भर्ती निकाली गई। लेकिन इन भर्तियों में नियमों को ताक पर रखने के गंभीर आरोप लगे कि तत्कालीन विधान परिषद के सभापति रमेश यादव का कार्यकाल 30 जनवरी 2021 को खत्म हो रहा था। सारी भर्तियां उनके कार्यकाल के रहते ही करनी थी। इसलिए नियमों को बार-बार बदल कर डेट तक आगे-पीछे की गई।

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इस भर्ती प्रक्रिया में एलाइड आईएएस के समकक्ष ओएसडी का पद भी शामिल कर लिया गया। उम्र की समय सीमा को दरकिनार कर दिया गया। 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को भर्ती कर लिया गया। वेटिंग लिस्ट वाले अभ्यर्थियों को भी नौकरी दे दी गई। एक शिकायतकर्ता नरेश कुमार ने तो दिसंबर, 2020 में ही अपनी शिकायत मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक पहुंचाई।

जिसमें बाकायदा रोल नंबर के जिक्र के साथ शिकायत की गई कि कई अभ्यर्थियों ने अपनी ओएमआर शीट खाली छोड़ दी। मगर टाइपिंग की परीक्षा के दौरान यही छात्र उन्हें फिर परीक्षा देते मिल गए। इसकी शिकायत विधानसभा के सक्षम अधिकारी से की गई। मगर सुनवाई नहीं हुई। आरोप लगे कि कई रसूखदारों के परिवारीजनों को भर्ती करने के लिए ही नियमों के संग खिलवाड़ किया गया।

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