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राहुल बाबा गेम पलटने का गेम खेल रहे,अब राजनीति के राजकपूर बनकर गुनगुनायेंगे ये गाना

दिल्ली । राहुल बाबा गेम पलटने का गेम खेल रहे हैं. बंगला खाली करने के बाद क्या करेंगे राहुल. देश के इंटेलेक्चुअल्स डिस्कस करने में जुटे हैं. कुछ बुद्धिजीवी अपनी बुद्धि लगा रहे हैं कि अभी तक राहुल गांधी ने सूरत के सेशन्स कोर्ट में अपील क्यों नहीं की. एक महीने का वक्त पंख लगा कर उड़ जाएगा. कहीं कांग्रेस अदालती लड़ाई के बजाय सियासी लड़ाई का तान बाना तो नहीं बुन रही है. एक से बढ़ कर एक कांस्पिरेसी थ्योरियां सामने रही हैं. टेंशन तो तब बढ़ी कि जब लगा कि राहुल गांधी की जेल जाने की तैयारी है. राहुल राजनीति के राज कपूर बनकर मुकेश का गाना गुनगुनाएंगे, ‘खोली भी छिन गई, बैंचें भी छिन गईं, सड़कों पर घूमता है अब कारवां हमारा. रहने को नहीं है घर, सारा जहां हमारा.’

 

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कांग्रेसी ये सोच कर कराह उठे हैं कि राहुलजी को उनके वतन में ही बेवतन कर दिया गया. कुछ राहुलजी के लिए भूदान आंदोलन शुरू करने की तैयारी में है. तो कुछ उन्हें दिल्ली में अपना घर देने की बात कर रहे हैं. वहीं बीजेपी वाले कह रहे हैं कि अपनी मम्मी के घर दस जनपथ पर क्यों नहीं चले जाते. बगल के गेट से एक मिनट में ही 24 अकबर रोड के पार्टी मुख्यालय में आने-जाने में वक्त ही बचेगा. साथ की कांग्रेस भी मजबूत होगी. सदस्यता रद्द हुई है तो बंगला तो खाली करना ही पड़ेगा.

गुलाम नबी आजाद का बंगला तो बरकरार रखा

कांग्रेसी बचाव की मुद्रा में कहते हैं- गुलाम नबी आजाद का बंगला तो बरकरार रखा गया है. लेकिन वो बेचारे ये नहीं समझ पा रहे हैं कि जिस शख्स के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंखों में आंसू आ गए हों, उसे रुलाने की हिम्मत भला किसकी है. वहीं जी-23 के नेता दबी जुबान से सलाह दे रहे हैं कि राहुल गांधी वापस उस कंटेनर में रहने क्यों नहीं चले जाते, जिसमें उन्होंने 135 दिन गुजारे थे. इससे जनता की सहानुभूति मिलेगी. शानोशौकत में पला-बढ़ा, हावर्ड-कैंब्रिज में पढ़ा एक गांधी आज कंटेनर में रहने को मजबूर है. मोदीजी के शासन में कमियां ज़रूर हैं.

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राहुल गांधी जो कहते हैं वो सही साबित हो जाता है

सुना है कि कंटेनर वाली सलाह पर राहुल कान भी दे रहे हैं. तब उन्होंने खुद ही बड़े शौक से बताया था कि जब कुछ दिन के लिए तुगलक लेन गया तो लगा कि अपने घर से परदेस आ गया हूं. कंटेनर तो मुझे अब अपना घर लगता है. कुछ लोग जो धरम-करम, और ज्योतिष में भरोसा करते हैं कि उनको लग रहा है कि राहुल गांधी जो कहते हैं वो सही साबित हो जाता है. उनके विपश्यना और ध्यान से सरस्वतीजी सिद्ध हो गई हैं. नोटबंदी पर सवाल उठाए, फिर जीएसटी पर सवाल उठाए तो सही में मुल्क की माली हालत खराब हो गई.

कोरोना के खतरे से आगाह किया तो वो भी सच साबित हुआ. लेकिन तब मोदीजी अपने अमेरिका के फ्रेंड डोनाल्ड ट्रंप के मोह में फंसे रह गए. हाल ही में राहुल गांधी के मुंह से प्रेस कांफ्रेंस में निकला कि अनफॉरचुनेटली आई एम एमपी तो संसद की सदस्यता चली गई. इसके पहले भारत जोड़ो यात्रा के वक्त बताया कि बावन साल से उनका अपना कोई घर नहीं.. तो फाइनली बेघर होने जा रहे हैं.

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राहुलजी को सरस्वती मिली लेकिन…

इन हितौषियों का मानना है कि तपस्या से राहुलजी को सरस्वती तो मिली लेकिन हिमालय में साधना से मोदी को श्रीसंपदा, समृद्धि, मान, सम्मान औऱ यशोगान सुनने का मौका मिला. देश-दुनिया में विश्वगुरु माने जाने लगे. वो राजर्षि हो गए. उन्हें योग के साथ राजभोग का अवसर प्राप्त हो रहा है तो राहुल गांधी को आपदा का सामना करना पड़ रहा है. इसलिए राहुल गांधी को अपने इष्टदेव बदल देने चाहिए. बहरहाल कुछ बता रहे हैं कि मोदीजी का मायाजाल तोड़ने के लिए सारे विपक्ष के नेता काले कपड़े पहन कर संसद आए थे. अब पर्दे के पीछे जादू-टोना-मंतर-मूठ का खेल चल रहा है. राहुलजी पर काशी के तांत्रिकों के जरिए मंत्र-तंत्र और उच्चाटन का प्रयोग कराया गया है. इसीलिए भटक जाते हैं.

भला बताओ किस देश की जम्हूरियत गरीबों के भरोसे चली है. मजलूमों के लिए नारे लगते हैं. लेकिन सियासत तो अमीरों के दम पर ही चलती है. बीस हज़ार करोड़ कहां से आया, इस बात पर अपनी राजनीति को दांव पर क्यों लगाया. इस चक्कर में बंदे के दस लाख करोड़ से ज्यादा शेयर मार्केट में स्वाहा हो गए. हुआ तो देश का ही नुकसान.

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ना मित्र पूंजीवाद पर सवाल उठाते, ना पिटीशनर अपने मुकदमे से स्टे हटाता, इधर राहुलजी सरकार पर हमला करते रहे, उधर मजिस्ट्रेट बदल गया. बस पंद्रह मिनट की बहस औऱ सतरह दिन के मुकदमे में राहुल गांधी का पता बदल गया. लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि खेल तो अब शुरू हुआ है, उधर अवमानना में सज़ा हुई, इधर चुनाव आयोग ने नोटिफिकेशन जारी कर दिया, लोकसभा सचिवालय ने आननफानन सदस्यता रद्द कर दी. ना रहेगा बांस-ना बजेगी बांसुरी.

संसद रहते तो वही घिसा-पिटा राग दोहराते

संसद सदस्य रहते तो वही अपना घिसा-पिटा राग दोहराते- बीस हज़ार करोड़ की रट लगाते और सरकार को शर्मिंदा करते. देश का मनोबल टूटता. जब मालूम है कि जेपीसी से भी कुछ होना नहीं तो फिर जांच की मांग क्यों करना. कमेटी में तो बीजेपी के सदस्य ज्यादा रहेंगे. लिहाजा सदस्यता ही खत्तम कर दो राहुल गांधी की. राजनीति के पंडित बता रहे हैं कि जब राहुल गांधी के खिलाफ ये दांव चला गया, तो सोचा गया कि राहुल पैदल हो जाएंगे, भक्तगण इसे देख कर आनंद मनाएंगे. मकान खाली कराने से पहले नल की सारी टोंटियां भी गिनवाई जाएंगी. क्या कर लेंगे राहुल गांधी. गुड़गांवा में कहीं फ्लैट लेकर मेट्रो से राजनीति करने दिल्ली आएंगे. उनकी सिक्योरिटी पर भी टैक्सपेयर का पैसा क्यों लगाएंगे.

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लेकिन राहुल को मालूम है कि हिंदुस्तान मे राजनीति के लिए उन्हें महात्मा गांधी बनना होगा. बताते हैं कि सूरत में फैसला सुनाए जाने के बाद राहुल गांधी जमानत लेने को तैयार नहीं थे. लेकिन लीगल टीम ने पेपर रेडी कर रखे थे, तुरंत मूव कर दिए. मजिस्ट्रेट साहेब भी पसीज गए थे. लेकिन पिक्चर अभी बाकी है. बीजेपी टेंशन में है कि राहुल गांधी अंदर ही अंदर क्या पका रहे हैं. कांग्रेस के बंदे अदालत क्यों नहीं जा रहे हैं. सुना है कि राहुल सोच रहे कि जब रहने को घर नहीं होगा तो जेल में रहना ही मुफीद होगा.

राहुल जेल गए 24 घंटे का चैनल कैसे चलाएंगे

अवमानना के मामले में राहुल गांधी के जेल जाने पर मोदी सरकार बचाव की मुद्रा में आ जाएगी. देश और दुनिया भर में सहानुभूति की लहर पैदा हो जाएगी. देश में लोकतंत्र नहीं है, ये बात पूरी तरह साबित हो जाएगी. विदेशी अखबारों में बड़ी-बड़ी सुर्खियां बन जाएगी. ट्रंप, बोल्सनारो, नेतन्याहू के साथ गिनती की जाएगी. वहीं देसी टीवी चैनलों को टेंशन है कि राहुल गर जेल चले गए तो फिर किसे गरियाएंगे. मोदीजी में कमियां हैं ही नहीं, 24 घंटे का चैनल कैसे चलाएंगे. तो क्राइम रिपोर्टर बहुत खुश हैं. तिहाड़ जेल के बाहर सब टेंट लगाएंगे. सूत्रों के हवाले से पल-पल की खबरें देंगे. आज राहुल को खाने में क्या मिला बताएंगे. डेस्क वाले एनीमेशन बनवाएंगे.

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मोदी सरकार को ये बड़ा टेंशन है. एक तो देश में जी-20 के लगातार सम्मेलन हैं. बड़े देशों के नेता अब आने से परहेज कर रहे हैं. एक भी ज्वायंट स्टेटमेंट अभी तक जारी नहीं हो पाया है. ऊपर से राहुल गांधी ये एक नया बवाल ले आया है. तो कांग्रेस की भी टेंशन कम नहीं है. राहुलजी अगर जेल चले गए तो पार्टी कौन चलाएगा. खरगेजी की कौन मानेगा बात और कौन सड़कों पर भीड़ जुटाएगा. वैसे तो राहुल गांधी के नाम पर लोग उमड़ पड़ते हैं. वरना कांग्रेसी तो नेता को दिखाने भर के लिए प्रदर्शन करते हैं. बहरहाल जनता-जनार्दन का ही भरोसा बचा है. उसके सामने कौन टिका है.

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SourceTv9

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