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लेखक के विचार

मुंहबली बाबा और 400 पार का शोर:: (आलेख : बादल सरोज)

पहले इस संसद के आख़िरी सत्र में और उसके बाद इसी रविवार को भाजपा सुप्रीमो नरेंद्र मोदी ने इस बार चार सौ पार का नारा देकर अपनी पार्टी के चुनाव अभियान – जो यूं भी 24 घंटा सातों दिन पूरी साल, सालों साल से चलता ही रहता है – का ढपोर शंख एक बार फिर फूंक दिया है। जितनी जोर से वे भी नहीं बोले होंगे, उससे कहीं ज्यादा जोर से उनकी गोदी मीडिया और आई टी सैल वाली चीखा ब्रिगेड ने उसे प्रतिध्वनित और गुंजायमान किया है। धारा 370, राम मन्दिर और जमकर नफरती मुहिम चलाकर ध्रुवीकरण के लिए आकाश पाताल एक करने के बाद भी लगता है सरोदा नहीं बंध पा रहा, भरोसा नहीं हो पा रहा है। इसलिए शुरुआती बढ़त बनाने के लिए गोयबल्स रूल बुक के नियम नम्बर एक ; “इतना बड़ा झूठ बोलो कि लोग उसे विचार करने लायक मान बैठें, फिर उसे इतनी बार बोलो कि लोग उसे सच मानने लगें” के अमल में जुट गए हैं। ऊंची-ऊंची हांकने के इस मनोवैज्ञानिक युद्ध में पहले वे मुंह की खा चुके हैं, इसलिए इस बार इसमें विपक्ष के टूटने-बिखरने का तड़का लगाने की भी जी-तोड़ कोशिशें हो रही हैं। इसके लिए ईडी, सीबीआई से भारत रत्न तक के दांव आजमाए जा चुके हैं, तब भी बात बनती नहीं दिखी, तो अब अलीबाबा के कलियुगी अवतार मुंहबली खुद झोला लेकर खरीददारी पर निकल पड़े हैं। ये भी आ जा, वो भी आ जा, तू भी आ जा की फेरी लगाते हुए अलीबाबा और उनके चालीसों के चालीस बाजार में निकले हुए हैं। 400 पार की इत्ती हड़बड़ी है कि ऐसे-ऐसे कैसे-कैसे हो रहे हैं – बंद मुट्ठी में जो कहीं के खरे कलदार थे, वे भी बिखर कर पैसे-पैसे हो रहे हैं। जिनको कभी वैसा-वैसा बताकर उनकी न जाने कैसा-कैसा कहकर सरे बाजार ऐसी तैसी करके अपनी खोटी चवन्नी चलाई थी, अब उन्हीं को मुकुट शिरोमणि बनाकर धारण करने की होड़ मची है।

इस सूची में सबसे ताजा नाम महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का जुड़ा है। ये वही अशोक चव्हाण हैं, जिन्हें मुम्बई के सबसे महंगे इलाके कोलाबा में बनी आदर्श हाउसिंग सोसायटी के घोटाले में 2010 में अपनी एक साल पुरानी मुख्यमंत्री की कुर्सी छोडनी पड़ी। आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला एक ऐसा घोटाला था, जिसने पूरे देश में गुस्सा और क्षोभ पैदा कर दिया था, क्योंकि इसे कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिकों तथा सेना के सेवानिवृत्त जवानों और अधिकारियों को मकान देने के नाम पर बनाया गया था। भांडा फूटा तो उजागर हुआ कि न सिर्फ इस 31 मंजिला बिल्डिंग को तानने के लिए सरकारी जमीन गलत तरीके से हथियाई गयी थी – बल्कि जिन कारगिल शहीदों के परिवारों और सेना के अफसरों और जवानों के नाम पर इसे बनाया गया था, फ्लैट्स देते समय बस वे ही थे, जिन्हें कोई मकान नहीं मिला। मुख्यमंत्री, राजनेता, नौकरशाह और बाकी सब इनमें आकर बस गए। इस भ्रष्टाचार के उजागर होने के बाद – चूंकि तब तक मोदी की भाजपा नहीं आयी थी और घोटालों के मामलों में इस्तीफे हुआ करते थे – अशोक चव्हाण को त्यागपत्र देना पडा। बाद में सीबीआई जांच में इन्हें दोषी भी पाया गया था – इनके खिलाफ मुकदमे भी दर्ज हुए थे। आदर्श हाउसिंग सोसायटी के घोटाले में सबसे ज्यादा उचककर बोलने वालों में भाजपा थी, जिसने इसे शहीद सैनिकों का अपमान, राष्ट्रद्रोह और न जाने क्या-क्या विशेषण दिए थे — वही भाजपा, जिसने 12 फरवरी को कांग्रेस से इस्तीफा देते समय “मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ” कहकर 13 फरवरी को भाजपा में शामिल होने वाले चव्हाण साहेब को 14 फरवरी को राज्यसभा के लिए भाजपा के प्रत्याशी के रूप में फॉर्म भरवा दिया। पंजाब के कैप्टन अमरिन्दर सिंह दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री हैं।

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यह सूची बहुत लम्बी है – इतनी लम्बी कि अब भाजपा में शामिल हुए कांग्रेसियों की कतार खुद भाजपाईयों से ज्यादा बड़ी हो गयी दिखने लगी है। इसी महाराष्ट्र में कुछ घंटे के पूर्व मुख्यमंत्री अजित पवार के घोटालों के कसीदे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी आम सभाओं में काढ़ा करते थे, इन दिनों वे उन्हीं की पार्टी द्वारा बाकी पार्टियों में तोड़फोड़ करके बनवाई गयी सरकार के माननीय उप मुख्यमंत्री हैं। ऐसे ही एक और महाशय हैं – हिमंता बिश्बसरमा, जो पहले कांग्रेस के नेता थे और जुलाई 2015 में भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय ने उनके भ्रष्टाचारों पर बाकायदा एक बुकलेट जारी की थी और खुद अमित शाह उस बुकलेट को लेकर असम में घूमे थे। कुछ महीनों बाद ही उन्होंने भाजपा में डुबकी लगा ली और ओम पवित्रं पवित्राय बोलकर इतने साफ़ सुथरे हो गए कि भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की पक्की पैरोकार भाजपा ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री बनाकर उसी असम पर बिठा दिया। वे अपने आपको पूर्वोत्तर का अमित शाह बताते हैं और पिछले कुछ समय से हर मुद्दे पर जहर उगलने में कंगना रनौत का मुकाबला कर रहे हैं। पिछली साल ही प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना में 10 करोड़ का भ्रष्टाचार करने का आरोप इनकी पत्नी पर लगा है ।

नारायण राणे, मुकुल रॉय, शुभेंदु अधिकारी, छोटू सिंधिया, थोड़ा सा पीछे जाएँ तो सुखराम सहित सारे दागियों को भाजपा की वाशिंग मशीन में हिंदुत्व के डिटर्जेंट से धो-खंगाल कर न सिर्फ अपने में समाहित कर लिया, बल्कि उन्हें शीर्ष पर भी बिठा लिया। सूची लम्बी है — सचमुच में बहुत लम्बी। इनमें व्यापम से लेकर नित नए घोटालों के रिकॉर्ड बनाने वाले, संघ दीक्षित, शाखा संस्कारित खांटी भाजपाई मुख्यमंत्रियों के कारनामों का जिक्र इसलिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकि बकौल चाल, चरित्र, चेहरा ब्रांड अलग तरह की पार्टी के प्रोटोकॉल के हिसाब से वैदिकी भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार न भवति!! समय के साथ मुहावरे, लोकोक्तियाँ, विशेषण विकसित होते रहते हैं, इस तरह भाषा भी समृद्ध होती जाती है।

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भाजपा ने भले राजनीतिक मानदंडों को कितना भी खोखला किया हो, शुचिता, नैतिकता और पारदर्शिता को कितना भी दरिद्र किया हो, किन्तु यह बात माननी पड़ेगी कि भाषा को, भले अन्यथा अर्थों में ही सही, बहुत समृद्ध किया है। दो हजार वर्ष पुराने जुडस इस्करियोती, हजार साल पुराने जयचंद, चार सौ साल पुराने मीर जाफर, डेढ़ सौ साल से कुछ पहले के सिंधिया जैसे विश्वासघात के विशेषण और मुहावरे बन गए पुराने संबोधनों को नए नाम ही नहीं दिए, नितिशिया देने, नितिशियापा करने जैसे उनके नए और म्यूटेटेड संस्करण भी दिए। इनमें से सबसे ताजा ताजा, अभी भी भट्टी से बाहर न निकला एक गरमागरम संस्करण है कमलनाथ!! वही कमलनाथ, जिनकी जीती-जिताई सरकार को बीच कोरोना में भाजपा उड़ा ले गयी थी, ढाई महीने पहले हुए मप्र विधानसभा के चुनाव में मोदी सहित सारे भाजपाई इन्हीं कमलनाथ के लत्ते लेते हुए घूम रहे थे –

अब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सहित अनेक नेता, उन्हें अपनी पार्टी में न्यौता देते दिख रहे हैं कुछ हैं, जो उनके अपनी पार्टी में आने को लेकर प्रमुदित हैं, तो कई ऐसे भी हैं, जिनमें असहजता देखी जा रही है और वे अपने ही नेताओं से गुहार लगा रहे हैं कि “भैय्ये, खरीदो, खूब खरीदो, मगर सड़ी सब्जी, बासे फल तो मत खरीदो!!” इधर कमलनाथ सब को सारे सुख दे रहे है ; पल में तोला पल में माशा, हर पल एक नया तमाशा बने हुए हैं। शेक्सपीयर के हेमलेट से भी आगे एक साथ ही हैं भी और नहीं भी – टू बी ऑर नॉट टू बी – की भूमिकायें निबाह रहे हैं। कमलनाथ खिसके, ये तो पक्की बात है, मगर यह तय होना बाकी है कि इसके हुए या उसके। पिछले तीन-चार दिन में उन्हें लेकर इतने मीम बने हैं, जितने शायद ही किसी के बने हों – वे मध्यप्रदेश की राजनीति के ऐसे दूल्हे हैं, जिन्होंने एक बार नहीं, दो-दो बार अपनी बरात खुद लुटवाई है।

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कहने को वे इन्दिरा गांधी के तीसरे बेटे होने और 22 साल की उम्र से कांग्रेस का सिपाही होने का दावा करते हैं, मगर इन दिनों वे मौसम विभाग के वायु दिग्दर्शक – विंड वेन – का मुर्गा बने बैठे हुए हैं। दिन में दो बार उनके दिल्ली वाले बंगले से मंदिर के बहाने लगाया गया झंडा उतरता है, चढ़ता है, उतरता है, चढ़ता है। यह झंडोत्तोलन उस समय विशेष पर उनकी सौदेबाजी की दिशा का संकेतक होता है। उनके बेटे और छिंदवाडा से उनके उत्तराधिकारी के रूप में सांसद नकुल नाथ ने ट्विटर (अब X) के अपने निजी ब्यौरे में से कांग्रेस डिलीट कर दी है। यूं पिता के साथ खड़े दिख रहे हैं, मगर पिता की तरह खंडन-वंडन करने के चक्कर में नहीं पड़ रहे हैं।

यही नफरी है, जिसके दम पर अलीबाबा के मुहावरे में कहें, तो 40 की जगह 400 का शोर मचाया जा रहा है । यही है वह रामराज्य, जिसका जाप दिल्ली के एक मण्डपम में भाजपा की जम्हूरी – जिसे न जाने किस आधार पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक कहा गया – में किया जा रहा था। इस बैठक, अधिवेशन, समावेश के राजनीतिक प्रस्ताव में दावा किया जा रहा था कि ‘’सिर्फ (राम) मंदिर ही नहीं बना है, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले दस साल में व्यावहारिक रूप से राम राज्य की अवधारणा को लागू कर दिया है।“ और यह भी कि ‘भगवान राम के आदर्शों का अनुसरण करते हुए, प्रधानमंत्री ने देश में सुशासन की स्थापना कर सच्चे अर्थ में ”राम राज्य’ की भावना को लागू किया है।“ मजेदार संयोग यह था कि रामराज की यह दावेदारी उस समावेश में की जा रही थी, जिसमे सबसे अगली पंक्ति में वी एस येदियुरप्पा विराजमान थे।

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कुल जमा यह कि दावे कितने भी सौ के कर लें, मगर हुक्मरानों के चेहरों पर आश्वस्ति नहीं है। चुनावी बांड को रद्द कर देने और उससे चन्दा देने वालों के नाम उजागर करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से थोड़ी घबराहट है – इसलिये नहीं कि इससे उन्हें पैसों का कोई टोटा पड़ने वाला है। बिलकुल नहीं पड़ेगा, जब तक कारपोरेट मेहरबान है, तब तक रूपये-पैसों के मामले में तो भाजपा को पहलवान रहना ही है। उनकी जो थोड़ी बहुत चिंता है, वह नाम उजागर होने और उनके जरिये उस एवज में किये गए काले काम उजागर होने की ज्यादा है। चंडीगढ़ महापौर चुनाव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा-सुना और फैसला सुनाया है –

उससे इन्हें लाज-वाज भले न आयी हो, किन्तु देश की जनता ने जरूर देख लिया कि इनसे लड़ने के सिर्फ ताकत और साहस जुटाना ही काफी नहीं होगा, चाइना गेट फिल्म के जगीरा के रूपक में उस कमीनेपन के प्रति भी सजग और चौकस रहना होगा, जिसे लोकतंत्र के अपहरणकर्ताओं का यह दल आजमाता रहता है। इन्ही सबका जोड़ है कि देश भर से घेर कर अयोध्या की मुफ्त यात्राओं की खेप-दर-खेप के बाद भी उन्हें डर है कि पता नहीं राम जी भी 2024 के लोकसभा चुनावों का बेड़ा पार करा पायेंगे कि नहीं –इसलिए खरीद फरोख्त सहित हर तिकड़म आजमा रहे हैं। उनकी आशंकाएं बेबुनियाद नहीं है ;

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16 फरवरी को संयुक्त किसान मोर्चा और ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच के आह्वान पर पूरे मुल्क में 1 लाख स्थानों पर हुई छोटी-बड़ी आंदोलनात्मक कार्यवाहियों का मतलब वे जानते हैं। इनसे और इसी के साथ किसान आन्दोलन में आई नयी-नयी लहरों से योजनाबद्ध तरीके से पनपाये गए भावनात्मक मुद्दों का कोहरा छंटा है, संभावनाओं का सूरज दिखाई दिया है। जनता और उसके रोजमर्रा के जीवन के मुद्दे चर्चा में ही नहीं आये, एजेंडे पर भी आ गए है ।

हुक्मरान जनता से डरते हैं, जागी और सड़कों पर आयी जनता से और भी ज्यादा डरते हैं – इसलिए यह सही समय है, जब राम के इन वंचक भगतों द्वारा ओढ़ी जा रही भेड़ की खाल को उतारने के लिए जद्दोजहद को तेज किया जाना चाहिए। देश के ज्यादातर संगठन अपनी-अपनी तरह से ऐसा ही कर रहे हैं ।

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(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।

नोट-इस आलेख से मिशन संदेश का सहमत होना जरूरी नहीं, ये आलेख लेखक के अपने निजी विचार हैं/ हो सकते हैं।

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